
जय और विजय
4 मिनट · विष्णु जी की कहानियाँ
भगवान विष्णु का धाम वैकुंठ है, जहाँ न कोई दुख है, न बुढ़ापा, न डर। वहाँ सोने और रत्नों के महल हैं, सुंदर बगीचे हैं, और हर ओर भगवान का नाम गूँजता है। वैकुंठ के सात द्वार हैं, और सातवें द्वार पर भगवान के दो प्यारे द्वारपाल पहरा देते थे, जिनके नाम थे जय और विजय।
ब्रह्मा जी के चार मानस पुत्र थे: सनक, सनंदन, सनातन और सनत्कुमार। इन्हें सनकादि ऋषि कहते हैं। वे बहुत बड़े ज्ञानी थे, पर हमेशा पाँच बरस के बालक जैसे दिखते थे। एक दिन वे भगवान विष्णु के दर्शन के लिए वैकुंठ पहुँचे। छह द्वार उन्होंने बिना रुके पार कर लिए, क्योंकि उनके लिए कहीं कोई रोक-टोक नहीं थी।
जब वे सातवें द्वार पर पहुँचे, तो जय और विजय ने उन्हें छोटे बच्चे समझकर रोक दिया। उन्होंने अपनी गदाएँ आगे करके कहा, "रुको, बच्चो! भगवान अभी विश्राम कर रहे हैं। तुम अंदर नहीं जा सकते।" उन्होंने ऋषियों का थोड़ा मज़ाक भी उड़ाया।
सनकादि ऋषियों को बहुत दुख हुआ। वे बोले, "वैकुंठ में तो सबके मन में भगवान का प्रेम होता है, कोई भेदभाव नहीं होता। तुम यहाँ रहकर भी घमंड और भेदभाव करते हो। इसलिए तुम्हें धरती पर जन्म लेना होगा, जहाँ काम, क्रोध और लोभ रहते हैं।"

श्राप सुनते ही जय और विजय काँप गए। वे ऋषियों के चरणों में गिर पड़े और बोले, "हमें क्षमा कीजिए। हमने बहुत बड़ी भूल की। बस इतनी कृपा कीजिए कि किसी भी जन्म में हम भगवान को न भूलें।" तभी शोर सुनकर भगवान विष्णु माता लक्ष्मी के साथ स्वयं द्वार पर आ गए।
भगवान को देखते ही सनकादि ऋषियों का क्रोध शांत हो गया। भगवान ने बड़े आदर से कहा, "मुनिवर, ये मेरे सेवक हैं, और सेवक की भूल स्वामी की भूल होती है। मैं आपसे क्षमा माँगता हूँ। आपका श्राप सच होगा, क्योंकि ब्राह्मणों का वचन मैं भी नहीं टालता।" ऋषि भगवान की विनम्रता देखकर भाव-विभोर हो गए और उनकी स्तुति करने लगे।

फिर भगवान ने जय और विजय से कहा, "तुम्हारे पास दो रास्ते हैं। या तो तुम सात जन्म मेरे भक्त बनकर धरती पर रहो, या तीन जन्म मेरे शत्रु बनकर, और फिर जल्दी मेरे पास लौट आओ।" जय और विजय ने कहा, "प्रभु, हम आपसे सात जन्म दूर नहीं रह सकते। हम तीन जन्म शत्रु बनेंगे, ताकि जल्दी लौट सकें।"
और ऐसा ही हुआ। पहले जन्म में वे हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु बने, जिन्हें भगवान ने वराह और नृसिंह अवतार लेकर मुक्ति दी। दूसरे जन्म में वे रावण और कुंभकर्ण बने, जिन्हें श्री राम ने मुक्ति दी। तीसरे जन्म में वे शिशुपाल और दंतवक्र बने, जिन्हें श्री कृष्ण ने मुक्ति दी। शत्रु बनकर भी वे हर पल भगवान के बारे में ही सोचते रहे, और अंत में फिर से वैकुंठ लौट आए।
दक्षिण भारत के कई विष्णु मंदिरों में, जैसे श्रीरंगम में, आज भी गर्भगृह के द्वार पर जय और विजय की बड़ी मूर्तियाँ खड़ी दिखती हैं। मार्गशीर्ष या पौष महीने की वैकुंठ एकादशी पर इन मंदिरों में एक ख़ास द्वार खोला जाता है, जिसे वैकुंठ द्वार कहते हैं। भक्त मानते हैं कि उस द्वार से भगवान के दर्शन करने से वैकुंठ का रास्ता खुलता है।
इस कहानी से हम सीखते हैं कि किसी को उसके रूप या उम्र से छोटा नहीं समझना चाहिए, और जहाँ भी हम हों, विनम्र रहना चाहिए। और यह भी कि भगवान अपने भक्तों को कभी नहीं छोड़ते, चाहे वे कितनी भी दूर क्यों न चले जाएँ। ॐ नमो नारायणाय!