
माता-पिता की परिक्रमा
4 मिनट · गणेश जी की कहानियाँ
कैलाश पर शिव जी और माता पार्वती के दो पुत्र थे, बड़े कार्तिकेय और छोटे गणेश। दोनों बड़े हुए तो माता-पिता को उनके विवाह की चिंता हुई। दोनों भाई चाहते थे कि पहले उनका विवाह हो। प्यार से दोनों को पास बुलाकर शिव जी और पार्वती जी ने कहा, "हम तुम दोनों को एक जैसा प्यार करते हैं। इसलिए एक होड़ रखते हैं। जो पूरी पृथ्वी की परिक्रमा करके पहले लौटेगा, उसका विवाह पहले होगा।"
यह सुनते ही कार्तिकेय अपने वाहन मोर पर बैठे और तेज़ी से उड़ चले। मोर बहुत तेज़ उड़ता है, और कार्तिकेय को पूरा भरोसा था कि वे ही जीतेंगे। उधर गणेश जी का वाहन था छोटा-सा मूषक, और उनका शरीर भारी था। सब सोचने लगे कि इस होड़ में गणेश जी का क्या होगा।

गणेश जी घबराए नहीं। वे शांत बैठकर सोचने लगे, "मूषक पर बैठकर मैं सारे समुद्र, पर्वत और वन पार करूँ, तो बरसों लग जाएँगे। पर माता-पिता ने यह होड़ रखी है, तो इसमें कोई गहरी बात ज़रूर होगी। आखिर पृथ्वी है क्या? और मेरे लिए सबसे बड़ा कौन है?" थोड़ी देर सोचने के बाद उनके चेहरे पर मुस्कान आ गई। उन्हें रास्ता मिल गया था।
उन्होंने स्नान किया, फिर माता-पिता से कहा, "कृपया एक आसन पर साथ बैठ जाइए।" शिव जी और पार्वती जी मुस्कुराते हुए बैठ गए। गणेश जी ने हाथ जोड़कर उनकी पूजा की और फिर श्रद्धा से उनके चारों ओर सात बार परिक्रमा की। फिर प्रणाम करके बोले, "मेरी परिक्रमा पूरी हुई। अब मेरा विवाह कराइए।"
शिव जी ने पूछा, "पुत्र, तुम तो यहीं से कहीं गए ही नहीं। पृथ्वी की परिक्रमा कैसे हुई?" गणेश जी ने विनम्रता से उत्तर दिया, "वेद और शास्त्र कहते हैं कि जो अपने माता-पिता की पूजा करके उनकी परिक्रमा करता है, उसे पूरी पृथ्वी की परिक्रमा का फल मिलता है। मेरे लिए आप ही मेरा पूरा संसार हैं। अगर शास्त्र की यह बात सच है, तो मैं जीत गया।"
गणेश जी ने आगे कहा, "अगर आप कहें कि मैं नहीं जीता, तो वेदों की बात झूठी हो जाएगी, और वेद कभी झूठे नहीं होते। इसलिए या तो मेरा विवाह कराइए, या फिर कहिए कि वेद गलत हैं।" अपने छोटे पुत्र की यह चतुराई और श्रद्धा देखकर शिव जी और पार्वती जी ने एक-दूसरे की ओर देखा और मुस्कुरा दिए।
यह सुनकर शिव जी और पार्वती जी बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा, "तुमने ठीक कहा। तुम्हारी बुद्धि सबसे श्रेष्ठ है। जो सच्चे मन से माता-पिता की सेवा करता है, उसे कोई तीर्थ ढूँढने की ज़रूरत नहीं।" सारे देवता भी गणेश जी की बुद्धि की प्रशंसा करने लगे।

उसी समय प्रजापति विश्वरूप अपनी दो सुंदर और गुणी पुत्रियों, सिद्धि और बुद्धि, के विवाह का प्रस्ताव लेकर आए। बड़े धूमधाम से गणेश जी का विवाह सिद्धि और बुद्धि से हुआ। सब देवता आए, मंगल गीत गाए गए। कुछ समय बाद सिद्धि से क्षेम और बुद्धि से लाभ नाम के दो पुत्र हुए। आज भी हम शुभ और लाभ, रिद्धि और सिद्धि के साथ गणेश जी को याद करते हैं।
उधर कार्तिकेय पूरी पृथ्वी पर घूम रहे थे। उन्होंने ऊँचे पहाड़ पार किए, गहरे समुद्रों के ऊपर से उड़े, घने जंगल और बड़ी-बड़ी नदियाँ देखीं, और रास्ते के हर तीर्थ में स्नान किया। जब वे लौट रहे थे, तब रास्ते में नारद मुनि मिले। नारद जी ने उन्हें बताया कि कैलाश पर तो गणेश जी का विवाह भी हो चुका है।
बहुत दिनों बाद कार्तिकेय कैलाश लौटे। उन्होंने देखा कि गणेश जी का विवाह हो चुका है और उनके पुत्र भी हैं। उन्हें बहुत दुख हुआ। उन्होंने माता-पिता को प्रणाम किया और कैलाश छोड़कर दक्षिण में क्रौंच पर्वत पर चले गए, जहाँ वे आज भी पूजे जाते हैं। माता-पिता ने उन्हें बहुत मनाया, और फिर स्वयं उनसे मिलने वहाँ जाते रहे।
शिव पुराण में आता है कि पुत्र के पास रहने के लिए शिव जी और पार्वती जी वहाँ ज्योति के रूप में बस गए। वही स्थान आज श्रीशैलम का मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग है, जो बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है। कहते हैं कि आज भी अमावस्या को शिव जी और पूर्णिमा को पार्वती जी वहाँ कार्तिकेय से मिलने जाते हैं।
इस कहानी से हम सीखते हैं कि तेज़ दौड़ने से ज़्यादा ज़रूरी है ठीक से सोचना, और यह कि हमारे माता-पिता ही हमारा पहला तीर्थ हैं। जो उनका आदर करता है, उसके हर काम में सिद्धि आती है।