
चंद्रमा को श्राप
4 मिनट · गणेश जी की कहानियाँ
गणेश जी को मोदक बहुत प्रिय हैं। एक बार भादों महीने की शुक्ल चतुर्थी को, उनके जन्मदिन पर, जगह-जगह उनकी पूजा हुई और भक्तों ने प्रेम से ढेर सारे मोदक और लड्डू चढ़ाए। गणेश जी ने हर भक्त का भोग प्रेम से स्वीकार किया, और खूब मोदक खाकर रात को अपने मूषक पर बैठकर घर लौट रहे थे। पेट बहुत भरा हुआ था, और चाँदनी रात थी।
रास्ते में अचानक एक साँप सामने आ गया। डर के मारे मूषक उछल पड़ा और गणेश जी नीचे गिर पड़े। उनका पेट फट गया और सारे मोदक इधर-उधर बिखर गए। गणेश जी ने शांति से सारे मोदक उठाकर फिर पेट में रखे, और उसी साँप को पेट पर कमरबंद की तरह बाँध लिया।

यह सब आकाश से चंद्रमा देख रहे थे। चंद्रमा को अपनी सुंदरता पर बहुत घमंड था। गणेश जी का बड़ा पेट, हाथी का मुख और यह गिरना देखकर वे ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगे। किसी के गिरने पर हँसना, और वह भी किसी के रूप का मज़ाक उड़ाकर, गणेश जी को बहुत बुरा लगा।
गणेश जी ने चंद्रमा से कहा, "तुम्हें अपनी सुंदरता पर इतना घमंड है? जाओ, आज से कोई तुम्हें देखना नहीं चाहेगा। जो तुम्हें देखेगा, उस पर झूठा कलंक लगेगा।" श्राप लगते ही चंद्रमा का प्रकाश चला गया। पूरी सृष्टि अँधेरे में डूब गई। रातें सूनी हो गईं, और देवता भी चिंता में पड़ गए।
चंद्रमा को अपनी भूल समझ आ गई। सब देवता उन्हें लेकर ब्रह्मा जी के पास गए। ब्रह्मा जी ने कहा, "यह श्राप गणेश जी ने दिया है, इसलिए इसे वही बदल सकते हैं। चंद्रमा को सच्चे मन से गणेश जी को प्रसन्न करना होगा।" ब्रह्मा जी ने चंद्रमा को कृष्ण पक्ष की चतुर्थी पर गणेश जी का व्रत करने की विधि बताई। चंद्रमा ने पूरी श्रद्धा से व्रत किया, मोदक और लड्डुओं का भोग लगाया, और गणेश जी का ध्यान किया।
व्रत से प्रसन्न होकर गणेश जी प्रकट हुए। चंद्रमा ने हाथ जोड़कर क्षमा माँगी, "प्रभु, मुझसे बड़ी भूल हुई। घमंड में मैंने आपका अपमान किया। मुझे क्षमा कीजिए।" गणेश जी का मन बहुत कोमल है। उन्होंने कहा, "दिया हुआ श्राप पूरी तरह वापस नहीं हो सकता, पर मैं इसे छोटा कर देता हूँ। अब से तुम हर महीने घटोगे और बढ़ोगे। केवल भादों की शुक्ल चतुर्थी को, मेरे जन्मदिन पर, जो तुम्हें देखेगा, उस पर झूठा कलंक लगेगा।"

गणेश जी ने चंद्रमा को एक वरदान भी दिया, "जिस कृष्ण चतुर्थी को तुमने मेरा व्रत किया, उस दिन लोग मेरा व्रत रखेंगे, और तुम्हें देखकर, तुम्हें अर्घ्य देकर ही व्रत खोलेंगे।" इसीलिए हर महीने की संकष्टी चतुर्थी पर आज भी लोग चाँद निकलने की राह देखते हैं, और चंद्रमा को जल चढ़ाकर ही व्रत पूरा करते हैं।
भादों की शुक्ल चतुर्थी को कलंक चतुर्थी भी कहते हैं, और गणेश चतुर्थी की रात लोग चाँद नहीं देखते। कहते हैं कि एक बार स्वयं भगवान कृष्ण ने इस दिन अनजाने में दूध में चाँद की परछाईं देख ली थी। कुछ ही दिनों में उन पर एक झूठा आरोप लग गया।
द्वारका में सत्राजित नाम के एक व्यक्ति के पास स्यमंतक नाम की एक चमत्कारी मणि थी, जो उसे सूर्य देव ने दी थी। एक दिन सत्राजित का भाई प्रसेन वह मणि पहनकर शिकार पर गया, और जंगल में एक शेर ने उसे मार डाला। शेर से वह मणि रीछों के राजा जाम्बवान ले गए। जब प्रसेन नहीं लौटा, तो लोग कहने लगे कि कृष्ण ने मणि के लालच में उसे मार दिया है।
अपना नाम साफ़ करने के लिए कृष्ण जी स्वयं मणि ढूँढने जंगल में निकले। निशान देखते-देखते वे जाम्बवान की गुफा तक पहुँचे। वहाँ जाम्बवान से उनका कई दिनों तक युद्ध हुआ। अंत में जाम्बवान ने पहचान लिया कि ये तो उनके प्रभु श्री राम ही हैं। उन्होंने आदर से मणि लौटा दी और अपनी पुत्री जाम्बवती का विवाह कृष्ण जी से कर दिया। द्वारका लौटकर कृष्ण जी ने सबके सामने मणि सत्राजित को लौटा दी, और सच सबके सामने आ गया।
इसीलिए कहा जाता है कि अगर भूल से इस दिन चाँद दिख जाए, तो घबराना नहीं चाहिए। गणेश जी का नाम लेकर स्यमंतक मणि की कथा सुनने से वह दोष मिट जाता है। और इस कहानी से हम यह सीखते हैं कि किसी के रूप या उसकी परेशानी पर कभी हँसना नहीं चाहिए, और भूल हो जाए तो सच्चे मन से माफ़ी माँग लेनी चाहिए।