
मार्कंडेय और महामृत्युंजय
4 मिनट · शिव जी की कहानियाँ
बहुत समय पहले मृकंडु नाम के एक ऋषि थे। वे और उनकी पत्नी मरुद्वती बहुत भक्ति वाले थे, पर उनके कोई संतान नहीं थी। संतान की इच्छा से दोनों ने भगवान शिव की लंबी तपस्या की। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव प्रकट हुए।
शिव जी ने कहा, "मैं तुम्हें पुत्र दूँगा। पर तुम्हें चुनना होगा। या तो ऐसा पुत्र लो जो बहुत लंबा जिए पर बुद्धि और गुणों में साधारण हो, या ऐसा पुत्र लो जो बहुत गुणवान, ज्ञानी और भक्त हो, पर जिसकी आयु केवल सोलह बरस हो।" ऋषि और उनकी पत्नी ने एक-दूसरे की ओर देखा और कहा, "प्रभु, हमें गुणवान पुत्र चाहिए, चाहे उसकी आयु छोटी हो।"

समय आने पर उनके घर एक तेजस्वी बालक ने जन्म लिया। उसका नाम रखा गया मार्कंडेय। वह बचपन से ही बहुत समझदार था। कम उम्र में ही उसने वेद और शास्त्र पढ़ लिए। सबसे बढ़कर, उसके मन में भगवान शिव के लिए अपार प्रेम था। वह रोज़ सुबह शिवलिंग पर जल, बेलपत्र और फूल चढ़ाता, और घंटों शिव जी का ध्यान करता।
जैसे-जैसे मार्कंडेय बड़ा होता गया, माता-पिता का मन उदास रहने लगा। जब वह पंद्रह बरस का हुआ, तो उसने देखा कि माँ अकेले में रोती हैं। उसने पूछा, "माँ, आप क्यों रोती हैं?" तब माता-पिता ने उसे शिव जी के वरदान की सारी बात बता दी। मार्कंडेय ने शांति से कहा, "आप चिंता मत कीजिए। जिन भगवान ने मुझे जीवन दिया है, वही मेरी रक्षा करेंगे।"
उस दिन से मार्कंडेय और भी गहरी भक्ति में डूब गया। वह एक शिव मंदिर में शिवलिंग के सामने बैठकर दिन-रात शिव जी का नाम जपने लगा। कहते हैं कि इसी समय उसके मुख से महामृत्युंजय मंत्र की महिमा फैली, वह मंत्र जो ऋग्वेद में आता है: "ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।" इस मंत्र में शिव जी से प्रार्थना है कि जैसे पका हुआ फल डाल से सहज अलग होता है, वैसे ही हमें मृत्यु के बंधन से छुड़ाकर अमरता दें।
फिर वह दिन आया जब मार्कंडेय सोलह बरस का हुआ। यमराज के दूत उसे लेने आए, पर बालक की भक्ति का तेज इतना था कि वे पास भी नहीं जा सके। वे लौट गए। तब स्वयं यमराज अपने भैंसे पर सवार होकर आए। उन्होंने कहा, "बालक, तुम्हारा समय पूरा हो गया है। चलो मेरे साथ।"
मार्कंडेय ने दोनों बाहों से शिवलिंग को कसकर गले लगा लिया और बोला, "मैं अपने भगवान को नहीं छोड़ूँगा।" यमराज ने अपना पाश यानी फंदा फेंका। वह फंदा मार्कंडेय के साथ-साथ शिवलिंग पर भी जा पड़ा। जैसे ही फंदे ने शिवलिंग को छुआ, शिवलिंग से एक तेज प्रकाश निकला।

उस प्रकाश में से भगवान शिव त्रिशूल लिए प्रकट हुए। उन्होंने यमराज को पीछे धकेल दिया और कहा, "यमराज, जो मेरी शरण में है, उसे कोई नहीं ले जा सकता।" यमराज ने हाथ जोड़कर क्षमा माँगी। इसीलिए शिव जी का एक नाम "कालांतक" भी है, यानी काल का भी अंत करने वाले। उनका दूसरा नाम "मृत्युंजय" है, यानी मृत्यु को जीतने वाले।
फिर भगवान शिव ने मार्कंडेय को आशीर्वाद दिया, "तुम सदा सोलह बरस के ही रहोगे, और चिरंजीवी रहोगे।" आगे चलकर मार्कंडेय एक महान ऋषि बने। मार्कंडेय पुराण उन्हीं के नाम से है। तमिलनाडु के तिरुक्कडैयूर मंदिर में आज भी यह कथा मनाई जाती है, और लोग लंबी आयु के लिए वहाँ पूजा करते हैं।
इस कहानी से हम सीखते हैं कि सच्ची भक्ति में इतनी शक्ति है कि वह भाग्य को भी बदल सकती है। डर के समय भगवान का हाथ पकड़े रहो, वे कभी नहीं छोड़ते। बोलो मृत्युंजय महादेव की जय!