
गंगा अवतरण
4 मिनट · शिव जी की कहानियाँ
यह कहानी भगवान राम के पूर्वजों की है। अयोध्या में सगर नाम के एक प्रतापी राजा थे। उनके साठ हज़ार पुत्र थे। एक बार राजा सगर ने अश्वमेध यज्ञ किया और यज्ञ का घोड़ा छोड़ा। देवराज इंद्र को डर हुआ कि सगर बहुत शक्तिशाली हो जाएँगे, इसलिए उन्होंने चुपके से घोड़ा चुरा लिया और उसे पाताल में तप कर रहे कपिल मुनि के आश्रम के पास बाँध दिया।
सगर के साठ हज़ार पुत्र घोड़ा ढूँढने निकले। धरती खोदते-खोदते वे पाताल तक पहुँच गए। वहाँ उन्होंने घोड़े को कपिल मुनि के पास बँधा देखा। बिना सोचे-समझे वे चिल्लाने लगे, "यही है चोर!" मुनि का ध्यान टूटा। उन्होंने जैसे ही आँखें खोलकर उनकी ओर देखा, उनके तेज से साठ हज़ार पुत्र वहीं भस्म हो गए।
बहुत दिनों बाद सगर के पोते अंशुमान घोड़ा खोजते हुए वहाँ पहुँचे। उन्होंने विनम्रता से मुनि को प्रणाम किया। गरुड़ जी ने उन्हें बताया, "तुम्हारे पूर्वजों की आत्मा को शांति तभी मिलेगी, जब स्वर्ग की पवित्र नदी गंगा का जल उनकी राख को छुएगा।" अंशुमान ने जीवन भर तप किया, फिर उनके पुत्र दिलीप ने भी, पर गंगा धरती पर नहीं आईं।
फिर दिलीप के पुत्र भगीरथ राजा बने। उन्होंने ठान लिया कि वे गंगा को धरती पर लाकर ही रहेंगे। वे राजपाट मंत्रियों को सौंपकर हिमालय चले गए और ब्रह्मा जी की कठोर तपस्या करने लगे। बरसों बाद ब्रह्मा जी प्रसन्न हुए और बोले, "गंगा धरती पर आएँगी। पर उनका वेग इतना प्रचंड है कि धरती उसे सह नहीं पाएगी। केवल भगवान शिव ही उन्हें थाम सकते हैं।"

अब भगीरथ ने भगवान शिव की तपस्या शुरू की। वाल्मीकि रामायण कहती है कि वे पूरे एक बरस तक केवल एक पैर के अँगूठे के बल खड़े रहे, हाथ ऊपर उठाए, केवल हवा पीकर। भोलेनाथ प्रसन्न हुए और बोले, "भगीरथ, मैं गंगा को अपने सिर पर धारण करूँगा।"
माँ गंगा को अपने वेग पर बड़ा गर्व था। उन्होंने सोचा, "मैं इतने ज़ोर से गिरूँगी कि शिव को भी बहाकर पाताल ले जाऊँगी।" वे पूरे वेग से आकाश से नीचे उतरीं। पर भगवान शिव ने अपनी जटाएँ फैला दीं, और गंगा उन जटाओं में ऐसी उलझ गईं कि बरसों तक बाहर का रास्ता ही न मिला। गंगा का घमंड टूट गया।
भगीरथ ने फिर हाथ जोड़कर प्रार्थना की। तब शिव जी ने अपनी जटा की एक लट खोलकर गंगा को धीरे से बहने दिया। हिमालय पर गंगा की कई धाराएँ बनीं। एक धारा राजा भगीरथ के रथ के पीछे-पीछे चल पड़ी। जहाँ-जहाँ भगीरथ जाते, गंगा उनके पीछे बहतीं।

रास्ते में जह्नु ऋषि का आश्रम आया। गंगा की धारा से आश्रम बह गया, तो ऋषि ने क्रोध में सारी गंगा पी ली! भगीरथ और देवताओं ने विनती की, तो ऋषि ने गंगा को अपने कान से बाहर निकाल दिया। इसीलिए गंगा को जाह्नवी भी कहते हैं, यानी जह्नु की बेटी। आख़िर गंगा पाताल पहुँचीं, और जैसे ही उनका जल राख पर पड़ा, सगर के साठ हज़ार पुत्रों को मुक्ति मिल गई।
भगीरथ के इसी प्रयास के कारण गंगा को भागीरथी कहते हैं, और आज भी कोई बहुत बड़ी मेहनत करे तो कहते हैं, "भगीरथ प्रयास"। ज्येष्ठ महीने में गंगा दशहरा का पर्व गंगा के धरती पर आने की याद में मनाया जाता है। भगवान शिव का एक नाम गंगाधर भी इसी से है।
इस कहानी से हम सीखते हैं कि हार न मानने वाले की मेहनत एक दिन ज़रूर रंग लाती है। तीन पीढ़ियों का सपना भगीरथ ने पूरा किया। और यह भी कि घमंड चाहे कितना भी बड़ा हो, एक दिन टूटता ही है। हर हर गंगे! हर हर महादेव!