
माखन चोर और ऊखल बंधन
4 मिनट · कृष्ण जी की कहानियाँ
गोकुल में नन्हे कान्हा बड़े हो रहे थे, और उनकी शरारतें भी बढ़ रही थीं। गाँव का हर घर दूध, दही और माखन से भरा रहता था, और कान्हा को माखन सबसे प्यारा था। वे अपने ग्वाल-बाल दोस्तों की टोली बनाकर चुपके से गोपियों के घर घुस जाते। माखन की मटकी ऊँचे छींके पर टँगी होती, तो वे ऊखल उलटा रखकर, दोस्तों के कंधे पर चढ़कर मटकी तक पहुँच जाते।
कान्हा अकेले नहीं खाते थे। माखन सब दोस्तों में बाँटते, और बाहर बैठे बंदरों को भी खिलाते। मुँह पर माखन लगा होता, फिर भी कोई पूछता तो भोलेपन से कहते, "मैंने नहीं खाया!" गोपियाँ यशोदा मैया से शिकायत करने आतीं, पर कान्हा का मासूम चेहरा देखकर उनका सारा ग़ुस्सा पिघल जाता। इसीलिए उन्हें प्यार से "माखन चोर" कहा जाने लगा।
एक दिन कान्हा के बड़े भाई बलराम और दोस्तों ने आकर कहा, "मैया, आज कान्हा ने मिट्टी खाई है!" यशोदा मैया ने कान्हा को पकड़ा और डाँटकर बोलीं, "क्यों रे, तूने मिट्टी खाई?" कान्हा ने भोला चेहरा बनाकर कहा, "नहीं मैया, सब झूठ बोल रहे हैं। देख लो, मेरा मुँह।" और उन्होंने अपना छोटा-सा मुँह खोल दिया।
यशोदा मैया ने झाँककर देखा, और देखती ही रह गईं। उस नन्हे मुँह में सारा ब्रह्मांड था! सूरज, चाँद, तारे, धरती, पर्वत, समुद्र, नदियाँ, और उसमें गोकुल गाँव, और उस गाँव में स्वयं यशोदा मैया, कान्हा का मुँह देखती हुईं। मैया काँप उठीं। वे सोचने लगीं, "यह सपना है या भगवान की माया? मेरा लाला कौन है?"

तभी भगवान ने अपनी माया फैला दी, और मैया सब भूल गईं। उन्होंने कान्हा को गोद में उठा लिया और प्यार से चूम लिया। भागवत पुराण कहता है कि भगवान ने अपनी माँ के प्रेम के लिए यह बात भुला दी, क्योंकि वे चाहते थे कि यशोदा उन्हें भगवान नहीं, अपना बेटा समझकर ही प्यार करें।
एक दिन यशोदा मैया दही मथ रही थीं। कान्हा भूखे थे, सो दूध पीने आ बैठे। तभी चूल्हे पर रखा दूध उबलने लगा, और मैया उसे उतारने चली गईं। कान्हा को ग़ुस्सा आया। उन्होंने पत्थर से दही की मटकी फोड़ दी, और भीतर जाकर छींके से माखन निकालकर बंदरों को खिलाने लगे। मैया लौटीं तो सब समझ गईं और छड़ी लेकर कान्हा के पीछे दौड़ीं।
कान्हा को पकड़कर मैया ने सोचा कि आज इसे ऊखल से बाँध दूँगी। वे रस्सी लाईं, पर रस्सी दो अंगुल छोटी पड़ गई। और रस्सी जोड़ी, फिर भी दो अंगुल छोटी! घर की सारी रस्सियाँ जोड़ दीं, पर हर बार दो अंगुल कम। मैया थककर पसीने से भीग गईं। माँ की थकान देखकर कान्हा का मन पिघल गया, और उन्होंने ख़ुद को बँधने दिया। तभी से उनका नाम पड़ा "दामोदर", यानी जिनके पेट पर रस्सी बँधी हो।

मैया घर के काम में लग गईं। आँगन के बाहर अर्जुन के दो जुड़वाँ पेड़ खड़े थे। कान्हा ऊखल खींचते हुए घुटनों के बल उन पेड़ों के बीच से निकल गए। ऊखल पेड़ों में अटक गया, कान्हा ने ज़ोर लगाया, और दोनों विशाल पेड़ धड़ाम से गिर पड़े! उनमें से दो दिव्य पुरुष निकले। वे कुबेर के पुत्र नलकूबर और मणिग्रीव थे, जिन्हें नारद मुनि के श्राप से पेड़ बनना पड़ा था। उन्होंने कान्हा की स्तुति की और मुक्त होकर स्वर्ग लौट गए।
इस कहानी से हम सीखते हैं कि भगवान को प्रेम से बाँधा जा सकता है, बल से नहीं। जो भगवान सारे ब्रह्मांड को अपने भीतर रखते हैं, वे एक माँ के प्यार की रस्सी में बँध गए। और बाँटकर खाने में ही असली आनंद है, जैसे कान्हा ने माखन सबमें बाँटा। जय माखन चोर कन्हैया!