
कालिया नाग का दमन
4 मिनट · कृष्ण जी की कहानियाँ
कुछ समय बाद नंद बाबा का परिवार गोकुल छोड़कर वृंदावन आ बसा। अब कान्हा थोड़े बड़े हो गए थे और रोज़ बलराम भैया और ग्वाल-बालों के साथ गायें चराने यमुना के किनारे जाते। वहाँ हरी घास, ठंडी हवा, और कदंब के पेड़ों की छाँव थी। कान्हा की बाँसुरी बजती, तो गायें भी झूम उठतीं।
पर यमुना के एक हिस्से में, जिसे कालिय दह कहते थे, एक बड़ी मुसीबत थी। वहाँ कालिया नाम का एक विशाल नाग अपने परिवार के साथ रहता था। उसके ज़हर से वहाँ का पानी खौलता रहता था। उसके ऊपर से उड़ने वाले पक्षी भी गिर पड़ते, और किनारे के पेड़-पौधे सूख गए थे। केवल एक कदंब का पेड़ बचा था।
एक दिन गर्मी में प्यासे ग्वाल-बालों और गायों ने अनजाने में उसी जगह का पानी पी लिया। पीते ही सब बेहोश होकर गिर पड़े। कान्हा ने यह देखा तो अपनी अमृत भरी दृष्टि से सबको फिर से जीवित कर दिया। पर उन्होंने तय कर लिया कि अब कालिया को यमुना से हटाना ही होगा, ताकि वृंदावन के लोग और पशु सुरक्षित रहें।
कान्हा अपना पटका कसकर उसी कदंब के पेड़ पर चढ़ गए। दोस्तों ने चिल्लाकर रोका, "कान्हा, मत जा! वहाँ नाग है!" पर कान्हा मुस्कुराए, और ऊँची डाल से छलाँग लगाकर सीधे ज़हरीले पानी में कूद पड़े। पानी में ज़ोर की हलचल हुई, और फिर सब शांत हो गया।

कालिया ग़ुस्से से फुफकारता हुआ बाहर आया और कान्हा को अपनी कुंडली में लपेट लिया। किनारे पर ग्वाल-बाल रोने लगे। ख़बर गाँव पहुँची, तो यशोदा मैया, नंद बाबा और सारे वृंदावनवासी दौड़े आए। सब घबराए थे, केवल बलराम जी शांत थे, क्योंकि वे जानते थे कि उनका छोटा भाई कौन है।
कान्हा ने अपना शरीर फैलाना शुरू किया। कालिया की कुंडली ढीली पड़ गई और उसे छोड़ना पड़ा। फिर कान्हा उछलकर उसके फनों पर चढ़ गए। कालिया के सौ से ज़्यादा फन थे। जो फन ऊपर उठता, कान्हा उस पर अपने नन्हे पैरों से थिरकते हुए नृत्य करने लगते। बाँसुरी की तान बज रही थी, और आकाश से देवता फूल बरसा रहे थे। धीरे-धीरे कालिया का घमंड और बल दोनों टूटने लगे।
तब कालिया की पत्नियाँ, नागपत्नियाँ, पानी से निकलीं और हाथ जोड़कर कान्हा से प्रार्थना करने लगीं, "प्रभु, हमारे पति ने बड़ा अपराध किया है, पर आपके चरणों का स्पर्श पाकर वह धन्य हो गया। दया कीजिए, इसे क्षमा कर दीजिए।" कालिया ने भी सिर झुकाकर कहा, "भगवन, मैं नाग हूँ, ज़हर मेरा स्वभाव है। आपने ही मुझे ऐसा बनाया। अब मैं आपकी शरण में हूँ।"

कान्हा का मन पिघल गया। उन्होंने कहा, "कालिया, अपने परिवार को लेकर रमणक द्वीप चले जाओ। वहाँ गरुड़ तुम्हें नहीं सताएँगे, क्योंकि तुम्हारे फनों पर मेरे पैरों के निशान हैं।" कालिया ने कान्हा की पूजा की, और अपने परिवार के साथ यमुना छोड़कर चला गया। यमुना का पानी फिर से साफ़ और मीठा हो गया।
कान्हा जब किनारे पर आए, तो यशोदा मैया ने उन्हें सीने से लगा लिया, और सारे वृंदावन में ख़ुशी छा गई। आज भी वृंदावन में यमुना के किनारे वह जगह कालिय घाट कहलाती है, और कहते हैं वहाँ का कदंब का पेड़ उसी समय की याद दिलाता है। कान्हा के इस रूप को "कालिया मर्दन" कहते हैं।
इस कहानी से हम सीखते हैं कि बुराई से डरना नहीं, उसका सामना करना चाहिए, और दूसरों की रक्षा के लिए आगे आना चाहिए। साथ ही यह भी कि हारे हुए को भी क्षमा करने का बड़प्पन होना चाहिए, जैसे कान्हा ने कालिया को क्षमा किया। बोलो कालिया मर्दन कृष्ण की जय!