
महिषासुर मर्दिनी
3 मिनट · दुर्गा जी की कहानियाँ
महिषासुर की कहानी उसके वरदान से शुरू होती है। उसने बरसों तक कठोर तप किया। ब्रह्मा जी प्रसन्न होकर प्रकट हुए और बोले, "वर माँगो।" महिषासुर ने सोचा, "स्त्री तो कोमल होती है, वह मुझे क्या हराएगी।" उसने कहा, "मुझे ऐसा वर दीजिए कि कोई देवता, कोई दानव, कोई पुरुष मुझे न हरा सके।" ब्रह्मा जी ने कहा, "तथास्तु।"

वर पाकर महिषासुर ने तीनों लोकों में आतंक मचा दिया। उसने स्वर्ग जीत लिया और देवताओं को निकाल दिया। तब सब देवताओं के तेज से माँ दुर्गा प्रकट हुईं। जब महिषासुर ने माँ की गर्जना सुनी, तो उसने अपनी विशाल सेना उनसे लड़ने भेजी। उसके सेनापति चिक्षुर, चामर, उदग्र, बाष्कल और न जाने कितने असुर लाखों सैनिकों के साथ आए।
माँ दुर्गा अपने सिंह पर बैठकर अकेले ही उस सेना के सामने खड़ी हो गईं। उनकी हर साँस से सैकड़ों गण पैदा होते, जो ढोल-नगाड़े बजाते हुए असुरों से लड़ते। माँ का सिंह गर्जना करता हुआ असुरों के बीच कूद पड़ता। एक-एक करके महिषासुर के सारे सेनापति माँ के सामने हार गए।
अब महिषासुर स्वयं युद्ध में आया। उसने भैंसे का रूप लिया और अपने सींगों से धरती खोदने लगा, पूँछ से समुद्र को उछालने लगा, और अपनी साँसों से पर्वत उड़ाने लगा। जब माँ ने उसे बाँधने के लिए पाश फेंका, तो वह भैंसा छोड़कर सिंह बन गया। माँ ने सिंह पर वार किया, तो वह तलवार लिए पुरुष बन गया। फिर वह एक विशाल हाथी बन गया, और फिर से भैंसा।

महिषासुर गरजता हुआ बोला, "मुझे कोई नहीं हरा सकता!" माँ दुर्गा मुस्कुराईं और बोलीं, "अरे मूर्ख, थोड़ी देर गरज ले। जब मैं तेरा अंत करूँगी, तब देवता यहीं गरजेंगे।" फिर माँ उछलकर भैंसे पर चढ़ गईं, अपने पैर से उसकी गर्दन दबा दी, और त्रिशूल से उसका अंत कर दिया। वह वरदान, जिसमें उसने स्त्री को कमज़ोर समझा था, उसी के घमंड को ले डूबा।
महिषासुर का अंत होते ही आकाश से फूलों की वर्षा होने लगी। देवता, गंधर्व और अप्सराएँ नाचने-गाने लगे। इंद्र और सब देवताओं ने माँ की स्तुति की, जिसे शक्रादि स्तुति कहते हैं। माँ प्रसन्न हुईं और बोलीं, "वर माँगो।" देवताओं ने कहा, "माँ, जब भी हम पर संकट आए, आप हमारी रक्षा करना।" माँ ने कहा, "जब भी तुम मुझे याद करोगे, मैं आऊँगी।"
देवताओं को उनका स्वर्ग वापस मिल गया। इसी दिन से माँ दुर्गा को "महिषासुर मर्दिनी" कहा जाता है, यानी महिषासुर को हराने वाली। परंपरा कहती है कि यह युद्ध नौ दिन और नौ रात चला, और दसवें दिन माँ की जीत हुई। इसीलिए हम नौ दिन नवरात्रि में माँ की पूजा करते हैं, और दसवें दिन विजयादशमी मनाते हैं।
बंगाल में दुर्गा पूजा के समय माँ दुर्गा की जो सुंदर मूर्तियाँ बनती हैं, उनमें माँ सिंह पर सवार होकर महिषासुर को हराती दिखती हैं। उनके साथ गणेश जी, कार्तिकेय, लक्ष्मी जी और सरस्वती जी भी होते हैं। सुबह के समय "या देवी सर्वभूतेषु" का पाठ गूँजता है।
इस कहानी से हम सीखते हैं कि किसी को कमज़ोर समझना सबसे बड़ी भूल है, ख़ासकर स्त्री को। माँ दुर्गा हमें याद दिलाती हैं कि सच्ची शक्ति धर्म और साहस के साथ होती है, और घमंड चाहे कितना भी बड़ा हो, एक दिन हारता है। जय माँ दुर्गा! जय महिषासुर मर्दिनी!