
गणेश जी ने लिखी महाभारत
4 मिनट · गणेश जी की कहानियाँ
वेद व्यास जी ऋषि पराशर और सत्यवती के पुत्र थे। उनका जन्म यमुना नदी के बीच एक छोटे-से द्वीप पर हुआ था, और उनका रंग साँवला था, इसलिए उनका पूरा नाम कृष्ण द्वैपायन है। बचपन से ही उनका मन तप और ज्ञान में लगता था। कौरव और पांडव उन्हीं के पोते थे, इसलिए उस पूरी कथा को उन्होंने अपनी आँखों के सामने होते देखा था।
बड़े होकर वे बहुत बड़े ज्ञानी बने। उन्होंने वेदों को चार भागों में बाँटा था, इसीलिए उन्हें वेद व्यास कहते हैं। एक बार उन्होंने अपने मन में एक महान कथा रची, कौरवों और पांडवों की कथा, जिसमें धर्म, जीवन और भगवद्गीता का पूरा ज्ञान समाया था। यह कथा इतनी बड़ी थी कि उसमें लगभग एक लाख श्लोक थे। व्यास जी सोचने लगे, "इतनी बड़ी कथा को लिखेगा कौन?"
तब ब्रह्मा जी उनके सामने प्रकट हुए। व्यास जी ने अपनी चिंता बताई। ब्रह्मा जी ने कहा, "इस काम को केवल गणेश जी ही कर सकते हैं। वे बुद्धि के देवता हैं, उन्हीं को याद कीजिए।" व्यास जी ने श्रद्धा से गणेश जी का ध्यान किया, और गणेश जी प्रसन्न होकर उनके सामने आ गए।

व्यास जी ने हाथ जोड़कर कहा, "प्रभु, मैं महाभारत की कथा बोलूँगा। क्या आप इसे लिखेंगे?" गणेश जी मुस्कुराए और बोले, "मैं लिखूँगा, पर मेरी एक शर्त है। एक बार लिखना शुरू करूँ, तो मेरी लेखनी रुकनी नहीं चाहिए। अगर आप बोलते हुए रुक गए, तो मैं लिखना छोड़ दूँगा।"
व्यास जी जानते थे कि इतनी बड़ी कथा बिना रुके बोलना बहुत कठिन है। उन्होंने भी एक शर्त रखी, "ठीक है प्रभु, पर आप भी कोई श्लोक तभी लिखेंगे जब उसका अर्थ पूरी तरह समझ लें।" गणेश जी ने यह शर्त मान ली। इस तरह दोनों की शर्तें तय हुईं और लेखन शुरू हुआ।
व्यास जी बोलते गए, और गणेश जी बहुत तेज़ी से लिखते गए। जब भी व्यास जी को आगे की कथा सोचने के लिए समय चाहिए होता, वे बीच में कोई बहुत कठिन श्लोक बोल देते, जिसके अर्थ गहरे और उलझे हुए होते। गणेश जी उसका अर्थ समझने के लिए एक पल रुकते, और उतनी देर में व्यास जी आगे के कई श्लोक मन में रच लेते। ऐसे कठिन श्लोकों को व्यास कूट भी कहते हैं।
महाभारत में ही व्यास जी कहते हैं कि इसमें आठ हज़ार आठ सौ ऐसे श्लोक हैं जिनका अर्थ केवल मैं जानता हूँ, मेरा पुत्र शुकदेव जानता है, और संजय जानते हों या न जानते हों। गणेश जी हर ऐसे श्लोक पर एक पल रुकते, उसका अर्थ समझते, और फिर उसी तेज़ी से लिखने लगते। इस तरह दोनों की शर्तें भी बनी रहीं और कथा भी आगे बढ़ती रही।

कहते हैं कि लिखते-लिखते एक बार गणेश जी की लेखनी टूट गई। शर्त थी कि लेखनी रुकनी नहीं चाहिए, इसलिए गणेश जी ने एक पल भी गँवाए बिना अपना टूटा दाँत उठाया और उसी को लेखनी बनाकर लिखते रहे। काम के प्रति ऐसी लगन देखकर व्यास जी का मन भर आया।
बहुत दिनों तक यह लेखन चलता रहा, और अंत में महाभारत पूरी हुई। यह संसार का सबसे बड़ा महाकाव्य है, और इसी में भगवान कृष्ण का दिया हुआ भगवद्गीता का उपदेश भी है। आज भी जब कोई ग्रंथ या नया काम लिखना शुरू करता है, तो सबसे पहले "श्री गणेश" लिखता है।
व्यास जी ने यह कथा अपने शिष्य वैशम्पायन को सिखाई, और वैशम्पायन जी ने राजा जनमेजय के यज्ञ में इसे सबको सुनाया। महाभारत को पाँचवाँ वेद भी कहते हैं। इसके बारे में स्वयं महाभारत में लिखा है कि जो इसमें है, वह दूसरी जगह भी मिल सकता है, पर जो इसमें नहीं है, वह कहीं नहीं मिलेगा।
इस कहानी से हम सीखते हैं कि जो काम हाथ में लें, उसे पूरी लगन से पूरा करें, और कोई भी काम करने से पहले उसे ठीक से समझ लें। गणेश जी की तरह मेहनत और समझ साथ हों, तो बड़े से बड़ा काम भी पूरा हो जाता है।