
लंका दहन
4 मिनट · हनुमान जी की कहानियाँ
सीता माता से आज्ञा लेकर हनुमान जी अशोक वाटिका में फल खाने लगे। पर उन्होंने सोचा, "मैं केवल दूत बनकर नहीं लौटूँगा। रावण को भी पता चलना चाहिए कि श्री राम के सेवक में कितना बल है।" उन्होंने पेड़ उखाड़ने शुरू कर दिए और पूरी वाटिका उजाड़ दी। केवल वही पेड़ छोड़ा, जिसके नीचे सीता माता बैठी थीं।
पहरेदार दौड़े-दौड़े रावण के पास गए। रावण ने एक के बाद एक बड़े योद्धा भेजे, पर हनुमान जी ने सबको हरा दिया। फिर रावण ने अपने पुत्र अक्षय कुमार को भेजा, वह भी नहीं बचा। अंत में रावण ने अपने सबसे बलवान पुत्र मेघनाद, जिसे इंद्रजीत भी कहते हैं, को भेजा।
मेघनाद ने देखा कि कोई अस्त्र हनुमान जी को रोक नहीं पा रहा। तब उसने ब्रह्मास्त्र चलाया। हनुमान जी को ब्रह्मा जी का वरदान था कि यह अस्त्र उन्हें हानि नहीं पहुँचाएगा, फिर भी ब्रह्मा जी का मान रखने के लिए वे स्वयं बँध गए। उन्होंने सोचा, "अच्छा है, इसी बहाने रावण से भी मिल लूँगा।" राक्षस उन्हें रस्सियों से बाँधकर रावण की सभा में ले गए।
रावण सोने के ऊँचे सिंहासन पर बैठा था। कहते हैं कि हनुमान जी को बैठने के लिए कोई आसन नहीं दिया गया, तो उन्होंने अपनी पूँछ बढ़ाकर उसे गोल-गोल लपेटा और उससे रावण के सिंहासन से भी ऊँचा आसन बनाकर उस पर बैठ गए। पूरी सभा देखती रह गई।

रावण ने गरजकर पूछा, "तुम कौन हो, और यहाँ क्यों आए हो?" हनुमान जी ने शांति से कहा, "मैं श्री राम का दूत हूँ। मैं तुम्हें समझाने आया हूँ। सीता माता को आदर सहित प्रभु को लौटा दो और उनसे क्षमा माँग लो। प्रभु बहुत दयालु हैं, वे तुम्हें क्षमा कर देंगे। नहीं तो तुम्हारी सोने की लंका नहीं बचेगी।"
यह सुनकर रावण क्रोध से लाल हो गया और बोला, "इस वानर को मार डालो!" तब रावण के छोटे भाई विभीषण उठे और बोले, "भैया, दूत को मारना धर्म के विरुद्ध है। उसे कोई और दंड दीजिए।" रावण ने कहा, "वानरों को अपनी पूँछ बहुत प्यारी होती है। इसकी पूँछ में आग लगा दो।"
राक्षसों ने हनुमान जी की पूँछ पर कपड़े लपेटने शुरू किए। पर हनुमान जी अपनी पूँछ बढ़ाते गए। जितने कपड़े लाते, सब कम पड़ जाते। लंका भर का कपड़ा और तेल खत्म हो गया। फिर उन्होंने पूँछ में आग लगा दी और हनुमान जी को नगर में घुमाने लगे। उधर जब सीता माता को यह पता चला, तो उन्होंने अग्नि देव से प्रार्थना की, "अगर मेरा मन सच्चा है, तो हनुमान के लिए शीतल हो जाना।" आग जल रही थी, पर हनुमान जी को ठंडी लग रही थी।
तभी हनुमान जी ने अपना शरीर छोटा किया, रस्सियों से निकल गए, और फिर बहुत बड़े हो गए। वे एक छत से दूसरी छत पर कूदने लगे। जहाँ-जहाँ जाते, उनकी जलती पूँछ से आग लगती जाती। देखते-देखते सोने की लंका धू-धू करके जलने लगी। केवल विभीषण का घर उन्होंने छोड़ दिया, क्योंकि वे श्री राम के भक्त थे।
फिर हनुमान जी ने समुद्र में जाकर अपनी पूँछ की आग बुझाई। अचानक उन्हें चिंता हुई, "कहीं आग अशोक वाटिका तक तो नहीं पहुँची?" उन्होंने जाकर देखा, सीता माता सुरक्षित थीं। उन्हें प्रणाम करके हनुमान जी ने फिर समुद्र के ऊपर से छलाँग लगाई और अपने साथियों के पास लौट आए।

सब वानर खुशी से नाचने लगे। हनुमान जी सीधे श्री राम के पास पहुँचे, चरणों में प्रणाम किया और कहा, "प्रभु, माता सीता मिल गईं। वे दुखी हैं, पर आपका नाम लेकर जी रही हैं।" फिर उन्होंने चूड़ामणि दी और कौए वाली बात सुनाई। चूड़ामणि देखते ही श्री राम की आँखें भर आईं। उन्होंने हनुमान जी को गले लगाकर कहा, "हनुमान, तुमने जो किया है, उसका बदला मैं कभी नहीं चुका सकता। मेरे पास देने को बस यह आलिंगन है।"
इस कहानी से हम सीखते हैं कि बड़े से बड़े घमंड के सामने भी सच और धर्म की बात शांति से कहनी चाहिए। रावण के पास सोने की लंका थी, पर उसके घमंड ने उसे जला दिया। और हनुमान जी ने इतना बड़ा काम करके भी सारा श्रेय अपने प्रभु को दिया। बोलो जय श्री राम!