
उल्लू कैसे बना लक्ष्मी जी का वाहन
3 मिनट · लक्ष्मी जी की कहानियाँ
यह एक लोक कथा है, जो दादी-नानी बच्चों को दिवाली के आसपास सुनाती हैं। बहुत पहले, जब सृष्टि बन रही थी, तब सब देवी-देवता अपने-अपने वाहन चुन रहे थे। भगवान विष्णु ने गरुड़ को चुना, शिव जी ने नंदी को, गणेश जी ने मूषक को, और सरस्वती जी ने हंस को। माता लक्ष्मी ने अभी तक किसी को नहीं चुना था।
यह ख़बर सारे जंगल में फैल गई। सब पशु-पक्षी बहुत ख़ुश हुए, क्योंकि धन और सौभाग्य की देवी का वाहन बनना सबसे बड़े सम्मान की बात थी। हाथी, घोड़ा, गाय, मोर, हिरण, शेर, सब सज-धजकर माता लक्ष्मी के पास पहुँचे। हर कोई अपनी ख़ूबियाँ गिनाने लगा।
हाथी ने कहा, "माँ, मैं सबसे बलवान हूँ, आपको आराम से ले चलूँगा।" मोर ने अपने सुंदर पंख फैलाकर कहा, "माँ, मैं सबसे सुंदर हूँ।" घोड़े ने कहा, "मैं सबसे तेज़ दौड़ता हूँ।" गाय ने कहा, "मैं सबसे पवित्र हूँ।" सब अपनी बात कहते रहे। उस भीड़ में एक उल्लू भी था, जो चुपचाप एक डाल पर बैठा सब सुन रहा था।

माता लक्ष्मी मुस्कुराईं और बोलीं, "तुम सब बहुत अच्छे हो। पर मैं हर बरस कार्तिक महीने की अमावस्या की रात धरती पर आती हूँ और घर-घर घूमती हूँ। उस रात जो मेरा इंतज़ार करेगा और मुझे सबसे पहले मिलेगा, वही मेरा वाहन बनेगा।" सब जानवर ख़ुशी-ख़ुशी लौट गए, और अमावस्या की रात की राह देखने लगे।
कार्तिक अमावस्या आई। वह साल की सबसे अँधेरी रात थी। सब जानवरों ने सोचा कि वे पूरी रात जागेंगे। पर दिन भर के काम से थककर, रात होते-होते एक-एक करके सबकी आँखें बंद होने लगीं। हाथी सो गया, घोड़ा खड़े-खड़े ऊँघने लगा, गाय बैठ गई, और मोर अपने पंख समेटकर सो गया।
पर उल्लू को रात में ही सबसे साफ़ दिखाई देता है। अँधेरे में उसकी बड़ी-बड़ी आँखें चमक रही थीं। वह जागता रहा, और ध्यान से रास्ता देखता रहा। आधी रात को जब माता लक्ष्मी धरती पर उतरीं, तो सबसे पहले उल्लू ने उन्हें देखा। वह उड़कर उनके पास पहुँचा और सिर झुकाकर बोला, "माँ, मैं आपका इंतज़ार कर रहा था।"

माता लक्ष्मी बहुत प्रसन्न हुईं। उन्होंने कहा, "तुम्हारा धैर्य और जागरूकता मुझे सबसे अच्छी लगी। आज से तुम मेरे वाहन हो।" तभी से उल्लू को लक्ष्मी जी का वाहन माना जाता है, ख़ासकर बंगाल की कोजागरी लक्ष्मी पूजा में माता को उल्लू पर बैठा दिखाया जाता है। कई जगह उल्लू को शुभ भी माना जाता है।
बड़े-बुज़ुर्ग इस कहानी का एक और अर्थ भी बताते हैं। उल्लू दिन में ठीक से नहीं देख पाता। यह हमें याद दिलाता है कि धन मिलने पर इंसान को उल्लू की तरह अंधा नहीं होना चाहिए, यानी घमंड में सही-ग़लत देखना नहीं छोड़ना चाहिए। लक्ष्मी जी के साथ विवेक भी ज़रूरी है।
इस कहानी से हम सीखते हैं कि अवसर उसी को मिलता है जो धैर्य से जागकर इंतज़ार करता है। अपनी तारीफ़ करने से बड़ा है अपना काम सच्चे मन से करना। और धन आने पर भी हमें अपनी आँखें खुली रखनी चाहिए, यानी समझदारी नहीं छोड़नी चाहिए। जय माँ लक्ष्मी!