
कोजागरी पूर्णिमा, को जागर्ति?
3 मिनट · लक्ष्मी जी की कहानियाँ
आश्विन महीने की पूर्णिमा को शरद पूर्णिमा कहते हैं। माना जाता है कि साल भर में केवल इसी रात चंद्रमा अपनी सोलहों कलाओं से पूरा होता है, और उसकी चाँदनी में अमृत जैसी ठंडक होती है। भागवत पुराण कहता है कि ऐसी ही शरद की पूर्णिमा की रात श्री कृष्ण ने वृंदावन में गोपियों के साथ महारास किया था।
इसी रात को कोजागरी पूर्णिमा भी कहते हैं। "कोजागरी" शब्द संस्कृत के "को जागर्ति" से बना है, जिसका अर्थ है, "कौन जाग रहा है?" परंपरा कहती है कि इस रात माता लक्ष्मी अपने वाहन उल्लू पर बैठकर धरती पर घूमती हैं, और हर घर के दरवाज़े पर रुककर पूछती हैं, "को जागर्ति? कौन जाग रहा है?"
जो लोग इस रात भगवान का नाम लेते हुए, दीप जलाकर, भजन गाते हुए जागते हैं, माता लक्ष्मी उनके घर में सुख और समृद्धि का आशीर्वाद देती हैं। जो आलस में सो जाते हैं, उनके दरवाज़े से माता चुपचाप आगे बढ़ जाती हैं। इसीलिए बंगाल, बिहार के मिथिला क्षेत्र और महाराष्ट्र में इस रात लक्ष्मी पूजा होती है और लोग रात भर जागते हैं।
इस रात की एक प्यारी परंपरा है खीर की। लोग चावल और दूध की खीर बनाकर उसे छत पर या आँगन में चाँदनी में रख देते हैं, ताकि चंद्रमा की अमृत भरी किरणें उस पर पड़ें। फिर सुबह वह खीर प्रसाद के रूप में सब मिलकर खाते हैं। बंगाल में घरों के फ़र्श पर चावल के घोल से सुंदर अल्पना बनाई जाती है, जिसमें कमल, धान की बालियाँ और लक्ष्मी जी के पैरों के निशान होते हैं।

इस पर्व से जुड़ी एक लोक कथा सुनाई जाती है। एक गाँव में दो परिवार पास-पास रहते थे। एक बहुत अमीर था, पर कंजूस और आलसी। दूसरा बहुत गरीब था, पर मेहनती और भगवान का भक्त। कोजागरी की रात अमीर परिवार ने सोचा, "हमारे पास तो सब है, जागने की क्या ज़रूरत?" और वे जल्दी सो गए। उनका घर अँधेरे में डूबा रहा।
गरीब परिवार के पास ज़्यादा कुछ नहीं था। पर उन्होंने आँगन लीपकर अल्पना बनाई, एक छोटा-सा दीया जलाया, थोड़े से चावल और दूध से खीर बनाई, और सारी रात बैठकर माता लक्ष्मी के भजन गाते रहे। बच्चे भी माँ की गोद में बैठकर कहानियाँ सुनते हुए जागते रहे।
आधी रात को माता लक्ष्मी उस गाँव में आईं। अमीर के घर पर पहुँचकर उन्होंने पूछा, "को जागर्ति?" कोई उत्तर नहीं आया। फिर वे गरीब परिवार के दरवाज़े पर पहुँचीं, और वहाँ से भजन की मीठी आवाज़ और दीये की रोशनी आ रही थी। माता ने पूछा, "को जागर्ति?" और पूरा परिवार एक साथ बोला, "माँ, हम जाग रहे हैं, आपकी राह देख रहे हैं।"

माता लक्ष्मी मुस्कुराईं और उन्हें आशीर्वाद दिया। अगले बरस उस परिवार के खेत लहलहा उठे, घर में अन्न भर गया, और उनके जीवन में सुख आया। पर उन्होंने कभी घमंड नहीं किया, और हर बरस कोजागरी की रात उसी भक्ति से जागते रहे।
इस कहानी से हम सीखते हैं कि लक्ष्मी जी आलस से नहीं, जागरूकता, मेहनत और भक्ति से आती हैं। "जागना" केवल रात भर आँखें खुली रखना नहीं, बल्कि अपने कर्तव्य के प्रति हमेशा सजग रहना है। जय माँ लक्ष्मी!