
समुद्र से लक्ष्मी जी का प्रकट होना
4 मिनट · लक्ष्मी जी की कहानियाँ
दुर्वासा ऋषि के श्राप से लक्ष्मी जी क्षीर सागर में समा गई थीं। भगवान विष्णु की सलाह पर देवता और असुर मिलकर समुद्र मंथन करने लगे। मंदराचल पर्वत मथानी बना, वासुकि नाग रस्सी बने, और भगवान ने कछुए के रूप में पर्वत को थामा। मंथन से हलाहल विष, कामधेनु, उच्चैःश्रवा घोड़ा, ऐरावत हाथी, कौस्तुभ मणि और कल्पवृक्ष निकले।
फिर समुद्र की लहरों के बीच एक अद्भुत प्रकाश फैला। एक विशाल, खिले हुए कमल पर एक अत्यंत सुंदर देवी प्रकट हुईं। उनके हाथों में कमल थे, चेहरे पर कोमल मुस्कान, और उनकी चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं। वे थीं माता लक्ष्मी, जिन्हें श्री, कमला और पद्मा भी कहते हैं। सब देवता, ऋषि और असुर उन्हें देखते ही रह गए।
सबने माता का स्वागत किया। इंद्र ने उनके बैठने के लिए एक सुंदर आसन दिया। गंगा, यमुना और सारी पवित्र नदियाँ सोने के कलशों में जल लेकर आईं। दिशाओं के हाथियों ने, जिन्हें दिग्गज कहते हैं, अपनी सूँड़ों से कलशों का जल माता पर उड़ेलकर उनका अभिषेक किया। इसीलिए माता के इस रूप को गजलक्ष्मी कहते हैं। समुद्र ने उन्हें पीले रेशमी वस्त्र दिए, और वरुण देव ने वैजयंती माला दी, जिसके फूल कभी नहीं मुरझाते।
विश्वकर्मा जी ने गहने दिए, सरस्वती जी ने मोतियों का हार, ब्रह्मा जी ने कमल, और नागों ने कुंडल। अब माता लक्ष्मी वैजयंती माला हाथ में लेकर उठीं। वे ऐसे वर को खोज रही थीं जो सबसे गुणी हो, और जिसमें कोई कमी न हो।

माता ने सबको ध्यान से देखा। भागवत पुराण बहुत सुंदर ढंग से बताता है कि उन्होंने किसे क्यों नहीं चुना। किसी में तप था, पर क्रोध भी था, जैसे दुर्वासा। किसी में ज्ञान था, पर मोह नहीं छूटा था। किसी में बड़ा बल था, पर वह अमर नहीं था। किसी में धर्म था, पर जीवों पर दया नहीं थी। कोई अमर था, पर उसमें सुंदरता या गुण नहीं थे। कोई सब में पूरा था, पर उसे लक्ष्मी की कोई चाह ही नहीं थी।
अंत में माता की दृष्टि भगवान विष्णु पर ठहरी। उनमें सारे गुण थे, वे सबका पालन करते थे, अमर थे, दयालु थे, और फिर भी किसी चीज़ के लिए लालायित नहीं थे। माता लक्ष्मी लजाते हुए आगे बढ़ीं और वैजयंती माला भगवान विष्णु के गले में डाल दी। आकाश से फूल बरसे, शंख और दुंदुभियाँ बजीं, और गंधर्व गाने लगे।

भगवान विष्णु ने माता लक्ष्मी को अपने वक्षस्थल, यानी हृदय पर स्थान दिया। इसीलिए भगवान के सीने पर एक चिह्न होता है, जिसे श्रीवत्स कहते हैं, और उन्हें श्रीनिवास भी कहते हैं, यानी जिनके हृदय में श्री निवास करती हैं। माता लक्ष्मी ने जिस पर कृपा दृष्टि डाली, वहाँ सब सुख आ गया। उनकी कृपा से देवताओं का तेज लौट आया।
कहा जाता है कि माता लक्ष्मी के प्रकट होने का दिन कार्तिक महीने की अमावस्या, यानी दीपावली थी, और कुछ परंपराएँ शरद पूर्णिमा भी मानती हैं। इसीलिए दिवाली पर लक्ष्मी पूजन होता है। ऋग्वेद के श्री सूक्त में माता की स्तुति है, जिसमें उन्हें कमल पर बैठी, हाथियों के जल से नहाई देवी कहा गया है।
इस कहानी से हम सीखते हैं कि लक्ष्मी उसी के पास रहती हैं जो गुणवान, दयालु और संतोषी हो। धन के पीछे भागने वाले के पास नहीं, बल्कि सबका भला करने वाले के पास लक्ष्मी अपने आप आती हैं। जय माँ लक्ष्मी! जय श्री लक्ष्मी नारायण!