
कूर्म अवतार और मोहिनी
3 मिनट · विष्णु जी की कहानियाँ
एक समय ऋषि दुर्वासा के श्राप से देवताओं की शक्ति और लक्ष्मी उनसे दूर चली गईं, और असुरों ने उन्हें हरा दिया। देवता भगवान विष्णु के पास गए। भगवान ने कहा, "क्षीर सागर को मथो। उसमें से अमृत निकलेगा, जिसे पीकर तुम फिर से बलवान और अमर हो जाओगे। यह काम बहुत बड़ा है, इसलिए असुरों से मित्रता करके उन्हें भी साथ लो।"
देवता और असुर मिलकर मंदराचल पर्वत को उखाड़ लाए और उसे मथानी बनाया। नागराज वासुकि रस्सी बने। पर जैसे ही मंथन शुरू हुआ, भारी पर्वत समुद्र में डूबने लगा, क्योंकि उसके नीचे कोई आधार नहीं था। सब घबरा गए। तब भगवान विष्णु ने एक विशाल कछुए, यानी कूर्म, का रूप लिया और पर्वत के नीचे जाकर उसे अपनी पीठ पर थाम लिया।

भगवान की पीठ एक लाख योजन चौड़ी थी, जैसे कोई बड़ा द्वीप हो। पर्वत उस पर घूमता रहा, और भगवान को ऐसा लगा मानो कोई उनकी पीठ खुजा रहा हो! भागवत पुराण कहता है कि भगवान ने उसी समय कई और रूप भी लिए। ऊपर से उन्होंने पर्वत को थामा, देवताओं और असुरों में बल भरा, और वासुकि को भी शक्ति दी, ताकि मंथन चलता रहे।
मंथन से सबसे पहले हलाहल विष निकला, जिसे भगवान शिव ने पीकर संसार को बचाया। फिर एक-एक करके चौदह रत्न निकले: कामधेनु गाय, उच्चैःश्रवा घोड़ा, ऐरावत हाथी, कौस्तुभ मणि, कल्पवृक्ष, अप्सराएँ, माता लक्ष्मी, चंद्रमा, और भी कई अद्भुत चीज़ें। अंत में आयुर्वेद के देवता धन्वंतरि हाथ में अमृत का कलश लिए प्रकट हुए।

अमृत देखते ही असुरों ने धन्वंतरि से कलश छीन लिया, और आपस में झगड़ने लगे कि पहले कौन पिएगा। देवता दुखी हो गए। तभी भगवान विष्णु ने एक अत्यंत सुंदर स्त्री का रूप लिया, जिसका नाम था मोहिनी। मोहिनी को देखकर असुर अपना झगड़ा भूल गए और बोले, "हे सुंदरी, तुम ही यह अमृत हम सबमें बराबर बाँट दो।"
मोहिनी ने मुस्कुराकर कहा, "ठीक है, पर मैं जैसे बाँटूँ, वैसे ही मानना होगा।" असुर मान गए। मोहिनी ने देवताओं और असुरों को अलग-अलग पंक्तियों में बिठाया, और देवताओं को अमृत पिलाने लगीं। असुर मोहिनी की मीठी बातों में खोए रहे। एक असुर स्वर्भानु वेश बदलकर देवताओं की पंक्ति में बैठ गया, पर सूर्य और चंद्रमा ने उसे पहचान लिया। भगवान ने चक्र से उसका सिर अलग कर दिया। अमृत पी चुका था, इसलिए उसका सिर राहु और धड़ केतु बनकर अमर हो गए। कहते हैं, इसीलिए राहु कभी-कभी सूर्य और चंद्रमा को ग्रहण लगाता है।
सारा अमृत देवताओं को मिल गया। फिर भगवान अपने असली रूप में आ गए। असुर बहुत क्रोधित हुए और युद्ध हुआ, पर अब अमृत पीकर देवता बलवान हो चुके थे, और उनकी जीत हुई। कूर्म भगवान के दस अवतारों में दूसरे अवतार हैं। आंध्र प्रदेश के श्रीकूर्मम में कूर्म भगवान का प्रसिद्ध मंदिर है।
इस कहानी से हम सीखते हैं कि बड़े काम के लिए धैर्य और मिलकर मेहनत चाहिए। भगवान सबका भार अपनी पीठ पर उठा लेते हैं, जैसे माँ-बाप बच्चों का। और यह भी कि लालच और झगड़े में पड़कर हम अपनी सबसे क़ीमती चीज़ भी गँवा देते हैं, जैसे असुरों ने अमृत गँवाया। ॐ नमो नारायणाय!