
गणेश चतुर्थी व्रत कथा
4 मिनट · गणेश जी की कहानियाँ
एक बार भगवान शिव और माता पार्वती नर्मदा नदी के सुंदर तट पर बैठे थे। पार्वती जी के मन में आया कि समय बिताने के लिए चौपड़ खेली जाए। शिव जी ने कहा, "खेल तो खेलेंगे, पर यह कौन तय करेगा कि कौन जीता और कौन हारा?"
पार्वती जी ने पास पड़े घास के तिनके इकट्ठे किए और उनसे एक छोटा-सा पुतला बनाया। फिर उसमें प्राण डाल दिए, तो वह एक बालक बन गया। पार्वती जी ने उससे कहा, "बेटा, हम चौपड़ खेल रहे हैं। तुम ध्यान से देखना और अंत में बताना कि कौन जीता।"
खेल शुरू हुआ। तीन बार बाज़ी हुई, और तीनों बार पार्वती जी जीतीं। पर जब बालक से पूछा गया, तो उसने भूल से कह दिया, "शिव जी जीते।" यह सुनकर पार्वती जी को बहुत क्रोध आया। उन्होंने बालक को श्राप दे दिया, "तुमने झूठा निर्णय दिया है। तुम एक पैर से लंगड़े हो जाओगे और यहीं कीचड़ में दुख भोगोगे।"

बालक रोने लगा। उसने हाथ जोड़कर कहा, "माता, यह भूल मुझसे अनजाने में हुई। मैंने किसी द्वेष से ऐसा नहीं किया। मुझे क्षमा कीजिए और बताइए कि इस श्राप से मुक्ति कैसे मिलेगी।" माता का हृदय पिघल गया। उन्होंने कहा, "यहाँ नाग कन्याएँ गणेश जी की पूजा करने आएँगी। उनसे गणेश व्रत की विधि सीखकर व्रत करना, तुम्हें मुक्ति मिल जाएगी।" यह कहकर शिव-पार्वती कैलाश लौट गए।
एक वर्ष बाद श्रावण महीने में नाग कन्याएँ वहाँ गणेश पूजा करने आईं। बालक ने हाथ जोड़कर उनसे गणेश व्रत की पूरी विधि पूछी।
नाग कन्याओं ने प्रेम से समझाया, "सुबह स्नान करके गणेश जी का ध्यान करो। मिट्टी से गणेश जी की छोटी-सी मूर्ति बनाओ, और उन्हें दूर्वा, लाल फूल, रोली और लड्डू चढ़ाओ। दिन भर व्रत रखो, मन में गणेश जी का नाम जपो, और उनकी कथा सुनो। रात को चंद्रमा को अर्घ्य देकर व्रत खोलो।" बालक ने उनकी हर बात ध्यान से सुनी और मन में बिठा ली। फिर उसने पूरी श्रद्धा से बारह दिन तक गणेश जी का व्रत और पूजा की। उसकी भक्ति से गणेश जी प्रसन्न होकर प्रकट हुए और बोले, "वरदान माँगो।"
बालक ने कहा, "प्रभु, मेरे पैरों में इतनी शक्ति दीजिए कि मैं चलकर कैलाश पहुँच सकूँ और माता-पिता के दर्शन कर सकूँ।" गणेश जी ने वरदान दिया। बालक के पैर ठीक हो गए और वह कैलाश पहुँचकर शिव जी के चरणों में जा बैठा। उसने शिव जी को पूरी कथा सुनाई।

उन दिनों माता पार्वती शिव जी से रूठकर दूर चली गई थीं। बालक की बात सुनकर शिव जी ने भी इक्कीस दिन तक गणेश व्रत किया। व्रत के प्रभाव से पार्वती जी का मन बदल गया और वे स्वयं कैलाश लौट आईं। पार्वती जी ने शिव जी से पूछा कि यह कैसे हुआ, तो शिव जी ने गणेश व्रत की महिमा बताई।
तब पार्वती जी ने अपने पुत्र कार्तिकेय से मिलने की इच्छा से इक्कीस दिन तक रोज़ इक्कीस दूर्वा, फूल और लड्डुओं से गणेश जी की पूजा की। इक्कीसवें दिन कार्तिकेय स्वयं दौड़े चले आए और माता से मिले। माता से इस व्रत की महिमा सुनकर कार्तिकेय ने भी यह व्रत किया।
कहते हैं कि कार्तिकेय ने यह व्रत ऋषि विश्वामित्र को बताया। विश्वामित्र ने इसे पूरी निष्ठा से किया, और गणेश जी की कृपा से उन्हें ब्रह्मर्षि का पद मिला। इस तरह यह व्रत एक से दूसरे तक पहुँचता गया, और आज घर-घर में माताएँ अपने परिवार की सुख-शांति के लिए यह व्रत रखती हैं।
इसीलिए कहा जाता है कि जो भी सच्चे मन से गणेश जी का व्रत करता है और यह कथा सुनता है, उसके बिगड़े काम बन जाते हैं, बिछड़े हुए मिल जाते हैं और संकट दूर हो जाते हैं। बोलो गणपति बप्पा मोरया!