
श्री कृष्ण का जन्म
4 मिनट · कृष्ण जी की कहानियाँ
बहुत पुराने समय में मथुरा नगरी पर कंस नाम का एक क्रूर राजा राज करता था। उसकी चचेरी बहन देवकी का विवाह वसुदेव जी से हुआ। कंस अपनी बहन से बहुत प्यार करता था, इसलिए विवाह के बाद वह स्वयं रथ चलाकर उन्हें विदा करने चला। तभी आकाश से एक आवाज़ आई, "हे कंस, जिस बहन को तू इतने प्यार से ले जा रहा है, उसी की आठवीं संतान तेरा अंत करेगी।"
यह सुनते ही कंस का प्यार डर में बदल गया। उसने तलवार निकाल ली। वसुदेव जी ने हाथ जोड़कर कहा, "राजन, अपनी बहन को मत मारो। मैं वचन देता हूँ कि हमारी हर संतान जन्म लेते ही तुम्हें सौंप दूँगा।" कंस मान गया, पर उसने देवकी और वसुदेव को कारागार में डाल दिया और पहरा बिठा दिया।
एक-एक करके देवकी की छह संतानों को कंस ने अपने हाथों मार डाला। सातवीं संतान को भगवान की माया ने देवकी के गर्भ से वसुदेव जी की दूसरी पत्नी रोहिणी के गर्भ में पहुँचा दिया, जो गोकुल में रहती थीं। वही बालक आगे चलकर बलराम कहलाए। फिर आई आठवीं संतान की बारी, और सारे संसार की आँखें उसी पर टिकी थीं।
भादों महीने के कृष्ण पक्ष की अष्टमी थी। आधी रात थी, बाहर तेज़ बारिश हो रही थी। तभी कारागार एक दिव्य प्रकाश से भर गया। देवकी और वसुदेव के सामने स्वयं भगवान विष्णु चार भुजाओं में शंख, चक्र, गदा और पद्म लिए प्रकट हुए। दोनों ने हाथ जोड़कर उनकी स्तुति की।

भगवान ने कहा, "मैं तुम्हारे पुत्र के रूप में आया हूँ। मुझे गोकुल में नंद जी के घर पहुँचा दो। वहाँ यशोदा जी ने अभी एक बेटी को जन्म दिया है। उस कन्या को यहाँ ले आओ।" इतना कहकर भगवान एक नन्हे बालक बन गए। वसुदेव जी की हथकड़ियाँ अपने आप खुल गईं, कारागार के ताले टूट गए, और सारे पहरेदार गहरी नींद में सो गए।
वसुदेव जी ने बालक को एक टोकरी में लिटाया, टोकरी सिर पर रखी और बाहर निकल पड़े। सामने यमुना नदी उफ़न रही थी। जैसे ही वे पानी में उतरे, पानी बढ़ने लगा, मानो यमुना मैया भगवान के चरण छूना चाहती हों। जब बालक का नन्हा पैर पानी से छू गया, तो यमुना शांत हो गईं और रास्ता दे दिया। पीछे से शेषनाग ने अपने फन फैलाकर बालक पर छाता तान दिया, ताकि बारिश की एक बूँद भी उस पर न गिरे।
वसुदेव जी गोकुल पहुँचे। नंद जी के घर सब सो रहे थे। उन्होंने धीरे से बालक को माता यशोदा के पास लिटाया, और वहाँ सोई नन्ही कन्या को उठाकर वापस मथुरा लौट आए। कारागार के ताले फिर बंद हो गए, और हथकड़ियाँ फिर लग गईं, जैसे कुछ हुआ ही न हो।

तभी कन्या रोने लगी। पहरेदार जाग गए और कंस को ख़बर दी। कंस दौड़ा आया और कन्या को छीनकर पत्थर पर पटकना चाहा। पर कन्या उसके हाथ से छूटकर आकाश में उड़ गई और आठ भुजाओं वाली देवी बन गई। वे योगमाया थीं। उन्होंने कहा, "मूर्ख कंस, तुझे मारने वाला तो जन्म ले चुका है, और सुरक्षित है।" इतना कहकर देवी अंतर्धान हो गईं।
उधर गोकुल में सुबह होते ही ख़ुशी की लहर दौड़ गई। सबने सुना कि नंद बाबा और यशोदा मैया के घर लाला आया है। गाँव भर में बधाइयाँ बजीं, ग्वाले नाचे, और दूध-दही की नदियाँ बह चलीं। यही दिन आज जन्माष्टमी के रूप में मनाया जाता है, जब भक्त आधी रात तक जागकर कान्हा का जन्म मनाते हैं।
इस कहानी से हम सीखते हैं कि बुराई कितनी भी ताक़तवर हो, भगवान अपने भक्तों की रक्षा का रास्ता निकाल ही लेते हैं। वसुदेव जी ने अँधेरी रात और उफ़नती नदी में भी हिम्मत नहीं छोड़ी। सच्चे विश्वास के आगे हर ताला खुल जाता है। नंद के आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की!