
धोबिन की दिवाली
3 मिनट · लक्ष्मी जी की कहानियाँ
यह दिवाली की एक बहुत पुरानी लोक कथा है। एक राज्य में एक दयालु राजा और रानी रहते थे। उसी नगर में एक गरीब धोबिन रहती थी, जो दिन भर नदी के घाट पर लोगों के कपड़े धोती। वह बहुत मेहनती और ईमानदार थी, पर उसका घर बहुत छोटा और साधारण था।
एक दिन रानी नदी में स्नान करने गईं। उन्होंने अपना क़ीमती मोतियों का हार उतारकर किनारे पर रख दिया। तभी एक कौआ उड़ता हुआ आया, चमकता हार अपनी चोंच में दबाया और उड़ गया। रानी ने बहुत खोजा, पर हार नहीं मिला। राजा ने नगर भर में घोषणा करवाई, "जो रानी का हार ढूँढकर लाएगा, उसे मुँह माँगा इनाम मिलेगा।"
उधर कौआ उड़ता हुआ उसी घाट पर पहुँचा जहाँ धोबिन कपड़े धो रही थी। हार भारी था, तो उसकी चोंच से छूटकर धोबिन के पास गिर पड़ा। धोबिन ने हार उठाया और पहचान गई कि यह तो रानी का हार है। उसके मन में एक पल भी लालच नहीं आया। उसने तुरंत कपड़े समेटे और हार लेकर राजमहल की ओर चल पड़ी।

राजा और रानी हार देखकर बहुत ख़ुश हुए। राजा ने कहा, "तुम्हारी ईमानदारी से हम बहुत प्रसन्न हैं। माँगो, क्या चाहिए? सोना, चाँदी, ज़मीन, जो चाहो।" धोबिन ने हाथ जोड़कर कहा, "महाराज, मुझे धन नहीं चाहिए। बस इतनी कृपा कीजिए कि इस बार दिवाली की रात पूरे नगर में किसी के घर दीया न जले, केवल मेरी झोंपड़ी में दीये जलें।"
राजा को यह माँग बड़ी अजीब लगी, पर वचन दे चुके थे। उन्होंने नगर भर में घोषणा करवा दी कि दिवाली की रात कोई दीया नहीं जलाएगा, केवल धोबिन के घर को छोड़कर। लोग हैरान थे, पर राजा की आज्ञा माननी थी।

कार्तिक अमावस्या की रात आई। सारा नगर अँधेरे में डूबा था। धोबिन ने अपनी छोटी-सी झोंपड़ी को लीपकर साफ़ किया, दरवाज़े पर रंगोली बनाई, और दर्जनों दीये जलाकर हर कोने में सजा दिए। उसकी झोंपड़ी ऐसे चमक रही थी, जैसे अँधेरे आसमान में एक तारा।
आधी रात को माता लक्ष्मी हर बरस की तरह धरती पर आईं। वे घर-घर घूमीं, पर हर घर अँधेरा था, दरवाज़े बंद थे। तभी उन्हें दूर एक झोंपड़ी जगमगाती दिखी। माता लक्ष्मी उसी ओर चल पड़ीं। धोबिन दरवाज़े पर हाथ जोड़े खड़ी थी। उसने कहा, "पधारिए माँ, मैं आपकी राह देख रही थी।"
लोक कथा कहती है कि उसी रात उस घर से दरिद्रता, जिसे अलक्ष्मी कहते हैं, चुपचाप बाहर चली गई, और माता लक्ष्मी ने भीतर आकर धोबिन को वचन दिया कि वे उसके घर में सदा रहेंगी। धीरे-धीरे धोबिन का घर सुख और समृद्धि से भर गया। पर वह पहले की तरह ही मेहनती और ईमानदार बनी रही।
इसीलिए आज भी दिवाली की रात हम घर साफ़ करते हैं, दरवाज़े पर रंगोली बनाते हैं, और हर कोने में दीये जलाते हैं, ताकि माता लक्ष्मी को हमारा घर दूर से ही जगमगाता दिखे। इस कहानी से हम सीखते हैं कि ईमानदारी सबसे बड़ा धन है, और लक्ष्मी जी उसी घर आती हैं जहाँ सफ़ाई, उजाला और सच्चा मन हो। शुभ दीपावली! जय माँ लक्ष्मी!