
किरात और अर्जुन
4 मिनट · शिव जी की कहानियाँ
यह कहानी महाभारत के समय की है। पांडव जुए में अपना राज्य हारकर बारह बरस के वनवास में थे। सबको पता था कि आगे चलकर कौरवों से एक बड़ा युद्ध होगा। तब महर्षि वेदव्यास ने युधिष्ठिर से कहा, "अर्जुन को हिमालय भेजो। वहाँ तप करके वह देवताओं से दिव्य अस्त्र प्राप्त करे, और सबसे पहले भगवान शिव को प्रसन्न करे।"
अर्जुन अपना गांडीव धनुष और तरकश लेकर अकेले हिमालय की ओर चल पड़े। वहाँ इंद्रकील पर्वत पर उन्होंने भगवान शिव की कठोर तपस्या शुरू की। पहले महीने वे तीन दिन में एक बार फल खाते, फिर छह दिन में एक बार, फिर पंद्रह दिन में एक बार, और चौथे महीने केवल हवा पीकर, हाथ ऊपर उठाए, एक पैर पर खड़े रहे। उनके तप के तेज से वहाँ के ऋषि भी हैरान थे।
ऋषियों ने भगवान शिव से कहा, "प्रभु, अर्जुन का तप बहुत कठोर है।" शिव जी मुस्कुराए और बोले, "मैं जानता हूँ अर्जुन क्या चाहता है। आज मैं उसकी परीक्षा लूँगा।" भगवान शिव ने एक किरात यानी वनवासी शिकारी का रूप लिया। माता पार्वती ने किराती का रूप लिया, और उनके गण भी शिकारियों के वेश में साथ चल पड़े।
उसी समय मूक नाम का एक दानव जंगली सूअर बनकर अर्जुन को मारने के लिए दौड़ा आया। अर्जुन ने उसे देखा और तुरंत गांडीव उठाकर बाण चलाया। ठीक उसी पल किरात ने भी अपना बाण छोड़ा। दोनों बाण एक साथ सूअर को लगे, और वह दानव वहीं गिर पड़ा।

अर्जुन ने किरात से कहा, "यह मेरा शिकार है। तुमने मेरे शिकार पर बाण क्यों चलाया? यह शिकार का नियम नहीं है।" किरात हँसा, "यह वन हमारा है, और पहले मेरा बाण लगा। अगर साहस है, तो बाण से फ़ैसला करो।" अर्जुन को क्रोध आ गया, और दोनों में युद्ध छिड़ गया।
अर्जुन ने बाणों की वर्षा कर दी, पर किरात मुस्कुराता रहा। उसके शरीर पर एक भी बाण का असर नहीं हुआ। धीरे-धीरे अर्जुन का अक्षय तरकश भी ख़ाली हो गया, जिसके बाण कभी ख़त्म नहीं होते थे! अर्जुन ने धनुष से मारना चाहा, तो किरात ने धनुष ही छीन लिया। फिर दोनों में कुश्ती हुई, और किरात ने अर्जुन को ऐसा दबाया कि वे कुछ पल के लिए बेहोश हो गए।
होश आने पर अर्जुन समझ गए कि यह कोई साधारण शिकारी नहीं है। उन्होंने मिट्टी से एक शिवलिंग बनाया, उस पर फूलों की माला चढ़ाई और भगवान शिव से बल माँगा। पर यह क्या! जो माला उन्होंने शिवलिंग पर चढ़ाई थी, वह किरात के सिर पर दिखाई दे रही थी। अर्जुन की आँखें भर आईं। वे समझ गए कि सामने स्वयं महादेव खड़े हैं।
अर्जुन दौड़कर किरात के चरणों में गिर पड़े और बोले, "प्रभु, मुझे क्षमा कीजिए। मैंने अनजाने में आपसे युद्ध किया।" उसी पल किरात और किराती के स्थान पर भगवान शिव और माता पार्वती अपने दिव्य रूप में प्रकट हो गए। भगवान शिव ने अर्जुन को उठाया और कहा, "अर्जुन, मैं तुम्हारी वीरता और भक्ति से बहुत प्रसन्न हूँ। तुम्हारे जैसा धनुर्धर कोई नहीं।"

भगवान शिव ने अर्जुन को अपना सबसे शक्तिशाली अस्त्र, पाशुपत अस्त्र दिया, और उसे चलाने और वापस लेने की विधि सिखाई। साथ में यह सीख भी दी कि यह अस्त्र कभी किसी कमज़ोर पर या बिना कारण नहीं चलाना है। उन्होंने अर्जुन का गांडीव और तरकश भी लौटा दिए। इसके बाद इंद्र, वरुण, कुबेर और यमराज ने भी अर्जुन को अपने-अपने दिव्य अस्त्र दिए।
संस्कृत के महाकवि भारवि ने इसी कथा पर "किरातार्जुनीयम्" नाम का प्रसिद्ध महाकाव्य लिखा है। आज भी यह कथा बताती है कि भगवान कभी-कभी कठिनाई के रूप में आकर हमारी परीक्षा लेते हैं।
इस कहानी से हम सीखते हैं कि घमंड छोड़कर विनम्र होने पर ही सच्ची जीत मिलती है। अर्जुन बल से नहीं, भक्ति और विनम्रता से जीते। और जीवन की कठिन परीक्षाएँ हमें और मज़बूत बनाने के लिए आती हैं। हर हर महादेव!