
अर्धनारीश्वर
4 मिनट · शिव जी की कहानियाँ
यह कहानी सृष्टि के बिल्कुल शुरू की है। भगवान शिव की आज्ञा से ब्रह्मा जी ने संसार बनाना शुरू किया। उन्होंने अपने मन से कई ऋषियों और प्रजापतियों को जन्म दिया। सनक, सनंदन जैसे ऋषि पैदा हुए, पर वे सब तप और ध्यान में लग गए। सृष्टि बनी तो, पर बढ़ी नहीं। जितने प्राणी ब्रह्मा जी बनाते, उतने ही रह जाते, आगे कोई नया जीवन नहीं आता था।
ब्रह्मा जी बहुत चिंतित हुए। वे सोचने लगे, "मैं इतना परिश्रम करता हूँ, फिर भी यह संसार क्यों नहीं बढ़ता? कहीं कुछ कमी रह गई है।" बहुत सोचने पर भी उन्हें उत्तर नहीं मिला। तब उन्होंने तय किया कि जिनकी आज्ञा से यह काम शुरू हुआ है, उन्हीं भगवान शिव से मार्ग पूछना चाहिए।
ब्रह्मा जी ने आँखें बंद कीं और शिव जी का ध्यान करते हुए कठोर तपस्या शुरू की। दिन बीते, बरस बीते। उनके मन में बस एक ही प्रार्थना थी, "हे महादेव, मुझे राह दिखाइए। यह सृष्टि कैसे आगे बढ़ेगी?" उनकी सच्ची लगन देखकर भगवान शिव प्रसन्न हो गए।

तभी आकाश में एक अद्भुत तेज फैला। उस प्रकाश में भगवान शिव एक ऐसे रूप में प्रकट हुए जो पहले किसी ने नहीं देखा था। उनका दायाँ आधा भाग शिव का था, सिर पर जटा, गले में सर्प, हाथ में त्रिशूल और शरीर पर भस्म। और बायाँ आधा भाग देवी का था, सुंदर केश, कान में कुंडल, हाथ में कमल और लाल वस्त्र। यह था अर्धनारीश्वर रूप, आधे ईश्वर और आधी नारी।
ब्रह्मा जी यह रूप देखकर भाव से भर गए। उन्होंने बार-बार प्रणाम किया और स्तुति की। शिव जी ने मुस्कुराकर कहा, "ब्रह्मा, तुम्हारी चिंता मैं जानता हूँ। तुमने अब तक केवल पुरुष ही बनाए हैं। सृष्टि को आगे बढ़ाने के लिए शक्ति भी चाहिए। शिव और शक्ति साथ हों, तभी जीवन चलता है।"
फिर भगवान शिव ने अपने भीतर से शक्ति को अलग किया। देवी अपने पूरे तेज के साथ सामने खड़ी हो गईं। ब्रह्मा जी ने हाथ जोड़कर देवी से प्रार्थना की, "माता, आप ही संसार की जननी हैं। कृपा कीजिए कि मेरी सृष्टि में भी नारी का जन्म हो, ताकि परिवार बनें और जीवन आगे बढ़े।"
देवी प्रसन्न हुईं। उन्होंने अपनी भौंहों के बीच से अपने जैसी ही एक शक्ति प्रकट की और कहा, "ब्रह्मा, तुम्हारी इच्छा पूरी होगी। मेरा यह अंश आगे चलकर तुम्हारे पुत्र दक्ष के घर बेटी बनकर जन्म लेगा।" यही शक्ति आगे चलकर सती बनीं, जिनका विवाह स्वयं शिव जी से हुआ।

इसके बाद शक्ति फिर से शिव जी में समा गईं, और भगवान अंतर्धान हो गए। अब ब्रह्मा जी ने पुरुष और नारी दोनों को बनाया। परिवार बने, बच्चे हुए, और संसार हँसने-खिलने लगा। जो सृष्टि रुकी हुई थी, वह अब चारों ओर फैलने लगी।
इसीलिए कहा जाता है कि शिव के बिना शक्ति अधूरी है और शक्ति के बिना शिव। एक प्रसिद्ध कहावत है कि शक्ति के बिना शिव "शव" के समान हैं, यानी बिना प्राण के। दोनों मिलकर ही पूरे हैं। शिव मंदिरों में शिवलिंग के साथ जो जलाधारी होती है, उसे भी शक्ति का रूप माना जाता है।
महाकवि कालिदास ने रघुवंश के पहले ही श्लोक में शिव और पार्वती को प्रणाम करते हुए लिखा है कि वे दोनों वैसे ही जुड़े हैं जैसे शब्द और उसका अर्थ। शब्द के बिना अर्थ नहीं, और अर्थ के बिना शब्द नहीं। मुंबई के पास एलीफेंटा की प्राचीन गुफाओं में अर्धनारीश्वर की एक बहुत सुंदर मूर्ति आज भी है, जिसे देखने दुनिया भर से लोग आते हैं।
इस कहानी से हम सीखते हैं कि पुरुष और नारी एक-दूसरे से छोटे या बड़े नहीं, बल्कि एक ही पूरे के दो आधे हिस्से हैं। घर हो या संसार, दोनों के सम्मान और साथ से ही सब कुछ सुंदर चलता है। बोलो अर्धनारीश्वर भगवान की जय!