
गोवर्धन पर्वत
4 मिनट · कृष्ण जी की कहानियाँ
हर बरस वर्षा ऋतु के बाद वृंदावन के लोग देवराज इंद्र की बड़ी पूजा करते थे। वे मानते थे कि इंद्र ही बादल भेजते हैं, और बारिश से ही घास उगती है, गायें दूध देती हैं। एक बरस कान्हा ने देखा कि सारा गाँव पकवान बनाने में लगा है। उन्होंने नंद बाबा से पूछा, "बाबा, यह किसकी पूजा की तैयारी है? और क्यों?"
नंद बाबा ने बताया, "बेटा, यह इंद्र देव का यज्ञ है। वे प्रसन्न रहेंगे, तभी बारिश होगी।" कान्हा मुस्कुराए और बोले, "बाबा, हम ग्वाले हैं। हमारा जीवन तो गायों से चलता है, और गायों को घास और पानी गोवर्धन पर्वत देता है। हमारे सबसे बड़े सहायक तो गोवर्धन और ये गायें हैं। क्यों न हम इस बार गोवर्धन की पूजा करें?"

कान्हा की बात सबके मन को भा गई। उस बरस वृंदावन वालों ने बनाए हुए सारे पकवान गोवर्धन पर्वत को चढ़ाए, गायों को सजाया और उनकी पूजा की, और पर्वत की परिक्रमा की। पकवानों का वह ढेर पर्वत जैसा ऊँचा था, इसलिए उसे "अन्नकूट" कहा गया। कहते हैं कि कान्हा ने एक दूसरा विशाल रूप लेकर कहा, "मैं गोवर्धन हूँ", और प्रेम से सारा भोग स्वीकार कर लिया।
जब इंद्र को पता चला कि उनकी पूजा बंद हो गई है, तो उन्हें बहुत घमंड भरा क्रोध आया। उन्होंने कहा, "एक छोटे-से ग्वाले की बात मानकर इन लोगों ने मेरा अपमान किया है!" उन्होंने प्रलय के बादलों को आज्ञा दी कि वृंदावन को डुबो दो। आकाश घने बादलों से भर गया, बिजली कड़कने लगी, और मूसलाधार बारिश शुरू हो गई।
बारिश रुकने का नाम नहीं ले रही थी। तेज़ हवा चल रही थी, ओले गिर रहे थे, और घर, खेत, सब पानी में डूबने लगे। गायें और बछड़े काँप रहे थे, बच्चे रो रहे थे। सारे लोग दौड़कर कान्हा के पास आए और बोले, "कान्हा, अब तुम ही बचाओ। तुम्हारे कहने पर ही तो हमने इंद्र की पूजा छोड़ी थी।"
कान्हा ने मुस्कुराकर कहा, "डरो मत। चलो, गोवर्धन के पास चलो।" सब गोवर्धन पर्वत के पास पहुँचे। तब सात बरस के नन्हे कान्हा ने अपने बाएँ हाथ की सबसे छोटी उँगली पर पूरा गोवर्धन पर्वत ऐसे उठा लिया, जैसे कोई बच्चा छतरी उठाता है! उन्होंने सबको बुलाया, "आओ, अपनी गायें, बछड़े और सामान लेकर नीचे आ जाओ।"
सात दिन और सात रात बारिश होती रही, और कान्हा बिना हिले पर्वत थामे खड़े रहे। सारा वृंदावन पर्वत के नीचे सुरक्षित था, एक बूँद भी किसी पर नहीं गिरी। आख़िर इंद्र समझ गए कि यह बालक कोई साधारण ग्वाला नहीं, स्वयं भगवान हैं। उन्होंने बादलों को लौटा लिया। धूप निकली, और कान्हा ने पर्वत को धीरे से वापस उसकी जगह रख दिया।

इंद्र अपने ऐरावत हाथी पर बैठकर आए, और साथ में कामधेनु गाय को लाए। उन्होंने कान्हा के चरणों में गिरकर क्षमा माँगी। कामधेनु ने अपने दूध से कान्हा का अभिषेक किया, और इंद्र ने उन्हें "गोविंद" नाम दिया, यानी गायों के रक्षक। तभी से दिवाली के अगले दिन गोवर्धन पूजा और अन्नकूट मनाया जाता है, और मथुरा के पास गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा आज भी लाखों भक्त करते हैं।
ब्रज में एक प्यारी लोक कथा भी सुनाई जाती है। जब कान्हा पर्वत थामे खड़े थे, तो उनके ग्वाल-बाल दोस्तों ने भी अपनी-अपनी लाठियाँ पर्वत के नीचे लगा दीं, ताकि कान्हा का बोझ हल्का हो। कान्हा मन ही मन मुस्कुराए, और सबको यह महसूस करने दिया कि उन्होंने भी मदद की। सच्चा मित्र वही है जो सबको साथ लेकर चले।
इस कहानी से हम सीखते हैं कि घमंड चाहे देवता का हो, एक दिन टूटता है। और यह भी कि जो प्रकृति, गायें और धरती हमें जीवन देते हैं, उनका सम्मान करना ही सच्ची पूजा है। मुसीबत में भगवान की शरण लो, वे पर्वत भी उठा लेते हैं। गिरिधारी गोपाल की जय!