
वीर जटायु
4 मिनट · राम जी की कहानियाँ
वनवास के दिनों में राम, सीता और लक्ष्मण कई ऋषियों के आश्रमों से होते हुए गोदावरी नदी के किनारे पंचवटी पहुँचे। रास्ते में उन्हें एक विशाल, बूढ़ा गिद्ध मिला। उसके पंख बहुत बड़े थे, और आँखों में बड़ी समझदारी थी। पहले तो लक्ष्मण को लगा कि यह कोई राक्षस है, पर गिद्ध ने प्यार से कहा, "बेटा, मैं तुम्हारे पिता दशरथ का मित्र हूँ। मेरा नाम जटायु है।"
जटायु ने बताया कि वे गिद्धों के राजा हैं, और उनके बड़े भाई का नाम संपाति है। उन्होंने कहा, "राम, यह वन बहुत बड़ा है, यहाँ राक्षस घूमते हैं। जब तुम और लक्ष्मण बाहर जाओगे, तो मैं सीता की रक्षा करूँगा।" राम ने जटायु को पिता की तरह प्रणाम किया। सीता जी भी उनका बहुत आदर करने लगीं।

पंचवटी में कुछ समय सुख से बीता। फिर एक दिन लंका के राजा रावण ने छल किया। उसके मामा मारीच ने सोने के हिरण का रूप धरा। सीता जी के कहने पर राम उसे पकड़ने गए, और फिर लक्ष्मण भी राम को ढूँढने निकल गए। सीता जी कुटिया में अकेली रह गईं। तभी रावण एक साधु का वेश बनाकर आया, सीता जी को ज़बरदस्ती अपने उड़ने वाले रथ में बिठाया, और आकाश में ले उड़ा।
सीता जी ज़ोर-ज़ोर से पुकारने लगीं, "हे राम! हे लक्ष्मण! कोई मुझे बचाओ!" एक पेड़ पर सोए जटायु की नींद खुली। उन्होंने देखा कि रावण सीता को ले जा रहा है। जटायु बहुत बूढ़े थे, और रावण बहुत बलवान, उसके पास दस सिर और बीस भुजाएँ थीं। पर जटायु ने एक पल भी नहीं सोचा। उन्होंने कहा, "रावण, रुक जा! मेरे रहते तू सीता को नहीं ले जा सकता।"
जटायु अपने विशाल पंख फैलाकर रावण पर टूट पड़े। उन्होंने अपनी चोंच और पंजों से रावण के रथ को तोड़ दिया, उसके घोड़ों और सारथी को गिरा दिया, और रावण का धनुष भी तोड़ डाला। बहुत देर तक भयंकर युद्ध चला। पर जटायु बूढ़े थे, धीरे-धीरे थक गए। तब रावण ने अपनी तलवार से जटायु के पंख काट दिए, और वे धरती पर गिर पड़े। रावण सीता को लेकर लंका की ओर उड़ गया।
उधर राम और लक्ष्मण कुटिया लौटे, तो सीता जी वहाँ नहीं थीं। दोनों भाई व्याकुल होकर वन-वन ढूँढने लगे। तभी उन्होंने देखा कि ज़मीन पर टूटा रथ और धनुष बिखरे हैं, और पास ही घायल जटायु पड़े हैं। राम दौड़कर उनके पास पहुँचे, धरती पर बैठ गए, और जटायु का सिर अपनी गोद में रख लिया।

जटायु ने आँखें खोलीं और धीमी आवाज़ में कहा, "राम, रावण सीता को दक्षिण दिशा की ओर ले गया है। मैंने उसे रोकने की पूरी कोशिश की।" इतना कहकर जटायु ने राम की गोद में ही प्राण त्याग दिए। राम की आँखों से आँसू बहने लगे। उन्होंने कहा, "लक्ष्मण, जटायु ने हमारे लिए अपने प्राण दे दिए। ये मेरे पिता के समान हैं।"
राम ने स्वयं अपने हाथों से जटायु का अंतिम संस्कार किया, जैसे कोई पुत्र अपने पिता का करता है। रामचरितमानस कहता है कि जिस गति के लिए बड़े-बड़े योगी तरसते हैं, वह जटायु को राम की गोद में मिली। जटायु की बात से ही राम को पता चला कि सीता को किस ओर ले जाया गया है, और वे दक्षिण की ओर चल पड़े।
इस कहानी से हम सीखते हैं कि अन्याय होते देखकर चुप नहीं रहना चाहिए, चाहे सामने कितना भी बड़ा बलवान हो। जटायु बूढ़े थे, फिर भी उन्होंने साहस से धर्म का साथ दिया। और राम ने दिखाया कि जो हमारे लिए त्याग करे, उसका सम्मान परिवार की तरह करना चाहिए। जय श्री राम! जय वीर जटायु!