
कुरुक्षेत्र में गीता का उपदेश
4 मिनट · कृष्ण जी की कहानियाँ
बारह बरस के वनवास और एक बरस के अज्ञातवास के बाद पांडवों ने अपना राज्य वापस माँगा। श्री कृष्ण स्वयं शांति दूत बनकर हस्तिनापुर गए और कहा, "पांडवों को केवल पाँच गाँव दे दो, युद्ध टल जाएगा।" पर दुर्योधन ने घमंड से कहा, "सुई की नोक के बराबर ज़मीन भी नहीं दूँगा।" अब युद्ध के सिवा कोई रास्ता नहीं बचा।
युद्ध से पहले अर्जुन और दुर्योधन दोनों कृष्ण से मदद माँगने द्वारका पहुँचे। कृष्ण ने कहा, "एक ओर मेरी पूरी नारायणी सेना है, दूसरी ओर मैं अकेला, और मैं हथियार नहीं उठाऊँगा।" दुर्योधन ने ख़ुशी-ख़ुशी सेना ले ली, और अर्जुन ने केवल कृष्ण को माँगा। इस तरह भगवान स्वयं अर्जुन के सारथी बने।
कुरुक्षेत्र के मैदान में दोनों सेनाएँ आमने-सामने खड़ी थीं। शंख बज उठे। अर्जुन ने कहा, "केशव, मेरा रथ दोनों सेनाओं के बीच ले चलो, मैं देखूँ तो सही कि मुझे किन-किन से लड़ना है।" कृष्ण रथ को बीच में ले गए, जिस पर हनुमान जी के चिह्न वाली ध्वजा लहरा रही थी।
अर्जुन ने सामने देखा। वहाँ उनके पितामह भीष्म थे, जिनकी गोद में वे खेले थे। गुरु द्रोणाचार्य थे, जिन्होंने उन्हें धनुष चलाना सिखाया। चाचा, भाई, मित्र, सब सामने खड़े थे। अर्जुन का मन काँप गया। उनके हाथ से गांडीव धनुष फिसल गया, और वे रथ पर बैठ गए। उन्होंने कहा, "कृष्ण, मैं अपनों को मारकर राज्य नहीं चाहता। मैं नहीं लड़ूँगा।"

तब श्री कृष्ण मुस्कुराए, और वहीं युद्ध के मैदान में उन्होंने अर्जुन को वह ज्ञान दिया जिसे आज हम भगवद् गीता के नाम से जानते हैं। गीता में अठारह अध्याय और सात सौ श्लोक हैं। कृष्ण ने सबसे पहले समझाया, "अर्जुन, आत्मा न कभी जन्म लेती है, न कभी मरती है। जैसे हम पुराने कपड़े उतारकर नए पहनते हैं, वैसे ही आत्मा पुराना शरीर छोड़कर नया शरीर लेती है।"
फिर उन्होंने गीता की सबसे प्रसिद्ध बात कही, "कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।" यानी, तुम्हारा अधिकार केवल अपना कर्म करने पर है, उसके फल पर नहीं। अपना कर्तव्य पूरे मन से करो, और फल की चिंता भगवान पर छोड़ दो। एक योद्धा का धर्म है अन्याय के विरुद्ध लड़ना, और यह युद्ध धर्म की रक्षा के लिए है।
कृष्ण ने यह भी कहा, "जब-जब धर्म की हानि होती है और अधर्म बढ़ता है, तब-तब मैं अवतार लेता हूँ, सज्जनों की रक्षा और धर्म की स्थापना के लिए।" अर्जुन ने पूछा, "प्रभु, आप कौन हैं? मुझे अपना असली रूप दिखाइए।" तब कृष्ण ने अर्जुन को दिव्य दृष्टि दी और अपना विश्वरूप दिखाया।

अर्जुन ने देखा कि कृष्ण के एक ही रूप में अनगिनत मुख हैं, अनगिनत भुजाएँ हैं, हज़ारों सूरजों जैसा प्रकाश है। उनके भीतर सारे देवता, ऋषि, पर्वत, नदियाँ, समुद्र, पूरा ब्रह्मांड समाया है। अर्जुन रोमांचित होकर हाथ जोड़े झुक गए। फिर उनकी प्रार्थना पर कृष्ण ने फिर से अपना सौम्य, मुस्कुराता रूप धारण किया। अंत में कृष्ण ने कहा, "सब छोड़कर मेरी शरण में आ जाओ, मैं तुम्हें हर पाप और डर से मुक्त कर दूँगा।"
अर्जुन का मोह दूर हो गया। उन्होंने गांडीव फिर उठाया और कहा, "केशव, मेरा भ्रम मिट गया। अब मैं वही करूँगा जो आप कहेंगे।" आज भी गीता जयंती मार्गशीर्ष महीने की एकादशी को मनाई जाती है, और दुनिया भर में लोग गीता पढ़कर जीवन का रास्ता पाते हैं।
इस कहानी से हम सीखते हैं कि जीवन में जब मन उलझ जाए, तो अपना कर्तव्य पूरी ईमानदारी से करो और फल भगवान पर छोड़ दो। डर और मोह से नहीं, धर्म और ज्ञान से निर्णय लो। जय श्री कृष्ण! गीता माता की जय!