
गणेश जी का जन्म
3 मिनट · गणेश जी की कहानियाँ
एक दिन कैलाश पर्वत पर माता पार्वती स्नान करने जा रही थीं। नंदी और शिव जी के सारे गण बाहर गए हुए थे, और द्वार पर पहरा देने वाला कोई नहीं था। माता की सखियाँ जया और विजया अक्सर कहती थीं कि कैलाश के सब गण तो शिव जी की ही बात मानते हैं, माता का भी अपना कोई होना चाहिए जो केवल उनकी आज्ञा माने।
तब माता ने अपने शरीर पर लगे हल्दी के उबटन से एक सुंदर बालक की मूर्ति बनाई और उसमें प्राण डाल दिए। बालक ने आँखें खोलीं तो माता ने उसे गले से लगा लिया और कहा, "तुम मेरे पुत्र हो। मैं स्नान करने जा रही हूँ। द्वार पर खड़े रहना और किसी को भी भीतर मत आने देना।" बालक ने हाथ में छड़ी ली और द्वार पर डट गया।
थोड़ी देर बाद भगवान शिव ध्यान से लौटे और भीतर जाने लगे। बालक ने रास्ता रोक लिया, "माता स्नान कर रही हैं, अभी कोई भीतर नहीं जा सकता।" शिव जी ने समझाया कि यह उनका अपना घर है, पर बालक अपनी माता की आज्ञा पर अडिग रहा।

शिव जी ने अपने गणों को भेजा। बालक ने अकेले ही सबको लौटा दिया। फिर देवता भी आए, पर कोई उस बालक को द्वार से हटा न सका। अंत में क्रोध में आकर शिव जी ने अपने त्रिशूल से बालक का सिर अलग कर दिया।
जब पार्वती जी ने यह देखा तो उनका दुख क्रोध बन गया। उनके क्रोध से अनेक शक्तियाँ प्रकट हुईं और पूरी सृष्टि काँपने लगी। देवता घबरा गए। ब्रह्मा जी और ऋषियों ने हाथ जोड़कर माता से शांत होने की प्रार्थना की। माता ने कहा, "मेरा पुत्र फिर से जीवित हो, और सब देवताओं में उसकी पूजा सबसे पहले हो। तभी मैं शांत होऊँगी।"
शिव जी ने गणों को आज्ञा दी, "उत्तर दिशा में जाओ। जो पहला प्राणी उत्तर की ओर सिर करके सोता मिले, उसका सिर ले आओ।" गणों को सबसे पहले एक हाथी मिला, और वे उसी का सिर लेकर लौटे। वह सिर बालक के धड़ पर रखा गया और शिव जी ने उसमें फिर से प्राण फूँक दिए। बालक मुस्कुराता हुआ उठ बैठा।

पार्वती जी ने अपने पुत्र को गोद में भर लिया। शिव जी ने बालक को अपना पुत्र माना और उसे अपने सब गणों का स्वामी बनाया। इसीलिए उनका नाम पड़ा गणपति, गणेश। हाथी का मुख होने से वे गजानन कहलाए। सब देवताओं ने वरदान दिया कि हर पूजा और हर शुभ काम में सबसे पहले गणेश जी की पूजा होगी।
तब से आज तक, चाहे नया काम शुरू हो, विवाह हो या कोई भी पूजा, सबसे पहले "श्री गणेशाय नमः" कहकर विघ्नहर्ता गणेश जी को याद किया जाता है। माता की आज्ञा के लिए अपने प्राणों तक की परवाह न करने वाले इस बालक से हम सीखते हैं कि माता-पिता की बात का मान रखना सबसे बड़ा धर्म है।