
गणेश जी एकदंत कैसे बने
4 मिनट · गणेश जी की कहानियाँ
गणेश जी का एक नाम है एकदंत, यानी एक दाँत वाले। उनकी हर मूर्ति में एक दाँत पूरा और दूसरा आधा टूटा होता है। यह दाँत कैसे टूटा, इसकी कहानी परशुराम जी से जुड़ी है।
परशुराम जी भगवान विष्णु के अवतार थे और शिव जी के बहुत बड़े भक्त थे। शिव जी ने ही उन्हें अपना दिव्य फरसा, यानी परशु, दिया था, इसीलिए उनका नाम परशुराम पड़ा।
उस समय कार्तवीर्य अर्जुन नाम का एक बहुत शक्तिशाली राजा था, जिसकी हज़ार भुजाएँ थीं। उसने परशुराम जी के पिता, ऋषि जमदग्नि के आश्रम से उनकी कामधेनु गाय छीन ली थी। परशुराम जी ने उस घमंडी राजा से युद्ध किया और उसे हरा दिया। इतनी बड़ी जीत के बाद वे सबसे पहले अपने गुरु शिव जी को प्रणाम करना चाहते थे, इसलिए सीधे कैलाश पहुँचे।
उस समय शिव जी और माता पार्वती भीतर विश्राम कर रहे थे, और द्वार पर गणेश जी पहरा दे रहे थे। गणेश जी ने विनम्रता से कहा, "मुनिवर, पिताजी अभी विश्राम कर रहे हैं। कृपया थोड़ी देर प्रतीक्षा कीजिए, फिर मैं आपको उनसे मिलवा दूँगा।"

परशुराम जी को लगा कि उन्हें अपने ही गुरु से मिलने से रोका जा रहा है। उन्होंने कहा, "मैं शिव जी का शिष्य हूँ, मुझे भीतर जाने दो।" गणेश जी अपनी बात पर अडिग रहे, क्योंकि पिताजी ने विश्राम के समय किसी को भीतर न आने देने को कहा था। दोनों में बहस बढ़ती गई, और फिर दोनों में युद्ध छिड़ गया।
ब्रह्मांड पुराण में आता है कि गणेश जी ने परशुराम जी को अपनी सूँड़ में लपेटकर ऊपर उठा लिया और पल भर में सातों लोकों की सैर करा दी, फिर धीरे से धरती पर रख दिया। इतने वेग से घूमकर परशुराम जी कुछ देर के लिए अचेत हो गए। होश आया तो उन्हें लगा कि एक बालक ने उनका अपमान किया है, और उनका क्रोध और भड़क उठा।
क्रोध में उन्होंने वही फरसा गणेश जी पर चला दिया जो शिव जी ने उन्हें दिया था। गणेश जी उस फरसे को तुरंत पहचान गए। उन्होंने सोचा, "यह मेरे पिता का दिया हुआ अस्त्र है। अगर मैं इसे रोकूँ या इसे खाली जाने दूँ, तो पिताजी के अस्त्र का अपमान होगा।" इसलिए गणेश जी ने उस वार से बचने की कोशिश नहीं की, और उसे अपने एक दाँत पर ले लिया। उनका एक दाँत टूटकर गिर पड़ा।
दाँत के धरती पर गिरते ही इतना ज़ोर का शब्द हुआ कि पूरा कैलाश काँप उठा। पर्वत हिल गए, समुद्रों में ऊँची लहरें उठीं, और देवता घबराकर देखने लगे कि क्या हुआ। टूटा दाँत ज़मीन पर पड़ा था, और गणेश जी फिर भी शांत खड़े थे।
शोर सुनकर शिव जी और पार्वती जी बाहर आए। अपने पुत्र का टूटा दाँत देखकर माता पार्वती बहुत दुखी और क्रोधित हुईं। परशुराम जी को अपनी भूल का एहसास हुआ। उन्होंने माता पार्वती से क्षमा माँगी, और गणेश जी के धैर्य और पिता के प्रति आदर को देखकर उनकी बहुत प्रशंसा की।

परशुराम जी ने हाथ जोड़कर माता पार्वती की स्तुति की और उन्हें जगत की माता कहकर प्रणाम किया। शिव जी ने भी पार्वती जी को समझाया, "परशुराम मेरा प्रिय शिष्य है, और गणेश ने जो किया, वह उसके बड़प्पन की निशानी है। उसने मेरे दिए अस्त्र का मान रखा है।"
माता का क्रोध शांत हुआ, और सब देवताओं ने गणेश जी को आशीर्वाद दिया। तभी से गणेश जी एकदंत कहलाने लगे। संकटनाशन गणेश स्तोत्र में गणेश जी के बारह नाम आते हैं, और उनमें दूसरा नाम एकदंत ही है: "प्रथमं वक्रतुण्डं च एकदन्तं द्वितीयकम्"। उनका टूटा दाँत कमज़ोरी नहीं, बल्कि उनके बड़प्पन की निशानी है। कहते हैं कि वही टूटा दाँत उन्होंने अपने हाथ में रखा, जिससे बाद में उन्होंने महाभारत भी लिखी।
इस कहानी से हम सीखते हैं कि बड़ों और माता-पिता का आदर हर हाल में करना चाहिए। गणेश जी चाहते तो उस वार को रोक सकते थे, पर उन्होंने पिता के अस्त्र का मान रखा। सच्चा बल दूसरों को हराने में नहीं, धैर्य और विनम्रता में है।